रविवार, 15 सितंबर 2013

अतुल्य भारत कब बनेगा अखंड भारत


कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। पहले मुगल शासकों ने हिंदू राजाओं का कत्लेआम कर उनके राज्यों पर कब्ज़ा कर लिया। ऐसा करके उन्होंने देश में आपसी वैमनस्यता के बीज बो दिए। उनके बाद आए अंग्रेजों ने भी किसी ना किसी तरह से फूट डालकर देश पर राज किया। सैकड़ों सालों की गुलामी के बाद हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजाद कराकर ऐसे प्यारे भारत की कल्पना की, कि जिसमें सौहार्द व आपसी तथा सर्वधर्म सम्मान का वातावरण तैयार किया, लेकिन आज सभी राजनीतिक लोग और कुछ ऐसे तत्व जो राज्य और देश में अशांति पैदा करने के लिए काम करते हैं, जिनके बदले उन्हें एक मोटी रकम मिलती है।
यहां ये प्रश्न उठता है कि ऐसे लोगों का दुष्कर्म उस राज्य और देश को पीछे छोड़ देता है। विकास की राह में, लेकिन आम जनता को व उसके परिवार को ऐसा जख्म दे जाता है, जो कि उसकी सात पुश्ते ना तो भूल पाती हैं और ना ही उबर पाती हैं। आम आदमी चाहे वो किसी धर्म, जाति का हो किसी भी राज्य का रहने वाला हो। जो आदमी अपने काम में मशरूफ रहकर दो जून की रोटी जुटाने में लगा रहता है उसका एक तो ये धर्म होता है और वो है कर्म। आज बहुत सारे प्रोफेशन और ऐसे कार्य हैं, जिसमें उस कार्य को पूरा करने के लिए एक पक्ष, एक समुदाय और दूसरे पक्ष व दूसरे समुदाय से है। परंतु कभी वो इस तरीके के झगड़े व विवाद में पड़ता हुआ दिखा है। इससे साफ जाहिर होता है कि चंद लोग अपने लाभ के लिए सिर्फ रोजगार या अन्य लोगों को अपने प्रभाव में ले लेते हैं कि वो आम आदमी उसके परिणाम से अपरिचित होकर उन लोगों की हाथों की कठपुतली बन जाता है और वैमनस्यता फैलाने के लिए जान की बाजी लगा देता है। आप चाहें वो धर्म के नाम पर या अन्याय हो (धार्मिक लोग या धर्माचार्य या सांप्रदायिक तनाव)। आज किसी भी घटना को सांप्रदायिक तनाव का रूप दे देते हैं और लाखों को दो जून की रोटी पाने के लिए मोहताज कर देते हैं। पिछली घटनाओं को अगर आप देखें तो सभी में आपको यही मिलेगा कि बच्चे आपस में खेल रहे थे और मोहल्लों में सांप्रदायिक दंगा हो गया। कहीं लाउडस्पीकर तेज बज रहा था तो उसके रोकने के लिए कहा गया और इस घटना ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। पिछले दस सालों मे प्रदेश में जिस तरीके से दंगे भड़क रहे हैं उससे आपसी खाई प्रतिदिन गहराती चली जा रही है। आप पिछले डेढ़ साल में अपने ही राज्य में 10-12 घटनाएं घटित होते देख चुके हैं। इससे राज्य सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा हो गया है। यहां सोचने का प्रश्न ये है कि हमारी सरकार ने इन घटनाओं को रोकने के लिए कभी ठोस कदम उठाए ही नहीं। हमारे यहां की एलआईयू कहां सोई रहती है घटना होने के पहले। घटना के बाद तो सारे राजनीतिक दल खुद को चमकाने के लिए जहर उगलने में लगे रहते हैं, जबकि कोई भी आवाम ऐसी कोई मांग नहीं करती है, ना ही ऐसा कोई कार्य करती है, जिससे कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो। कोई भी पार्टी या सरकार अथवा प्रशासन और उस शहर की जनता इस बात को ना तो उठाती है और ना ही ध्यान देती है। प्रदेश में इतनी बड़ी तादाद में अवैध हथियारों का जखीरा रातों-रात कहां से आ जाता है और रातों-रात ही वो गायब भी हो जाता है।
आनन-फानन में प्रशासनिक अधिकारी को ट्रांसफर करने की जो प्रथा है उससे इस घटना को प्रशासनिक दोष कहकर जनता को गुमराह किया जाता है और नए अधिकारी को भेजकर अपने आप को राजनीतिक वोट देने वालों को ये बताने का प्रयास किया जाता है कि देखो हम आपके साथ हैं। हमारा ब्रजमंडल भी ऐसी घटनाओं से अछूता नहीं है। हाल में न्यूजपेपर्स में आगरा में भी इस तरीके की कई घटनाओं को सांप्रदायिक रूप देने की कोशिश की गई, लेकिन आगरा की जनता व प्रशासन की तत्परता से उन घटनाओं पर समय रहते रोक लग गई, लेकिन राज्य सरकार ने अफसरों का ट्रांसफर करके लोगों में ये संदेश दिया कि हम आपके साथ हैं।
मेरे एक कोसी के व्यवसायी मित्र ने कहा कि आज भी हमारे यहां बाजार सुचारू रूप से चालू नहीं हैं और व्यापार का पलायन हरियाणा व राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों में हो रहा है। रोजमर्रा के खाने-कमाने वाले लोगों के लिए काफी दयनीय स्थिति है। हाल ही मुजफ्फर दंगों के बाद प्रमुख न्यूजपेपर के पहले पेज पर एक लड़की का फोटो छपा है। उसके नीचे लिखा है कि मेरा कसूर क्या है। मेरे जेहन में एक बात उठती है कि बेटा इसमें तेरा या मेरा नहीं है। हमारा कसूर सिर्फ इतना है कि हम आम आदमी हैं। आम आदमी होते हुए भी हम दो जून की रोटी भी चैन से नहीं खा सकते हैं। ये घटना तो उन चंद लोगों की कारगुजारी का कसूर है कि जो हमें घाव देते हैं। उसका हमें व हमारी आने वाली पीढ़ियों को दर्द झेलना होगा। उस लड़की की बात दिल को छूते हुए ये विचार सोचने पर मजबूर कर देती है कि आम आदमी जो देर शाम तक अपनी रोटी कमाने की जुगत में लगा रहता है। उसका कसूर क्या है और उसे कब तक इस नई समस्या से मुक्ति मिलेगी और कब हमारा अतुल्य भारत अखंड भारत बन पाएगा।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

बच्चे मन के सच्चे.....

बच्चे मन के सच्चे, सारी जग की आंख के तारे.....

उपरोक्त गाने का अर्थ देखें और गौर करें तो मालूम होता है कि इसमें बचपन का कितना सजीव चित्रण किया गया है और ये नौनिहालों के प्रेम के प्रति जीवंत उदाहरण भी पेश करता है, लेकिन आज माता-पिता की आंख के तारों को स्कूल प्रशासन, जिला प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं ने अपने कार्यक्रमों को सफल और आकर्षित बनाने का एक जरिया बना लिया है। इन कार्यक्रमों में जिस तरीकों से नौनिहालों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे माता-पिता के हृदय को काफी दुख पहुंचता है। आप अक्सर न्यूज पेपर्स में पढ़ते और फोटो देखते होंगे कि निजी व सरकारी कार्यक्रमों में या अन्य किसी प्रकार के कार्यक्रमों में नौनिहालों का प्रदर्शन आवश्यक सा हो गया है। किसी भी स्कूल की रैली हो या कोई और प्रदर्शन वह इनके बिना अधूरा है। यहां एक वाक्ये का जिक्र करना उचित रहेगा, जिसे सुनकर आप उन नौनिहालों की दयनीय स्थिति का अंदाजा अच्छे से लगा सकेंगे। अभी सिने जगत की एक नामी अभिनेत्री ने एक नामचीन न्यूज चैनल के यमुना बचाओं कार्यक्रम में हिस्सा लेने आगरा आईं और इस कार्यक्रम में शहर के तमाम स्कूलों के बच्चे भी पर्यावरण बचाओ अभियान का हिस्सा बने।
काफी अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि 4-5 घंटे तक भूखे प्यासे नौनिहाल इस कार्यक्रम में बैठे रहे। एक ओर तो हम नौनिहालों को देश का भविष्य मानते हुए उन्हें भगवान का दर्जा देते हैं, वहीं, दूसरी ओर से नौनिहाल एक अभिनेत्री के इंतजार में घंटों धूप में बैठे रहे। आखिरकार वो क्षण भी आया कि जब अभिनेत्री आई भी और पांच मिनट के फोटो सेशन के बाद फुर्र हो गई। टीवी चैनल का कार्यक्रम भी हो गया और पांच मिनट में यमुना भी निर्मल हो गई। मुझे अभी तक ये समझ नहीं आया कि उस कार्यक्रम से किसे और क्या फायदा पहुंचा। दुनियाभर का भीड़-भड़क्का वहां जमा रहा। इसमें वहां दर्शक बने तमाम लोगों का समय भी खराब हुआ और जो नौनिहाल वहां आए थे, उनकी एक दिन की पढ़ाई ठप हुई सो अलग। वैसे ही कॉलेज और स्कूलों में साल भर में कितने दिन सही मायने में पढ़ाई होती है। ये किसी से भी छुपा हुआ नहीं है। इसके अलावा शहर में ही होने वाले कई कार्यक्रमों में सेलिब्रिटी के इंतजार में नौनिहालों को बेहोश होते हुए भी देखा है। बड़ा ताज्जुब होता है कि स्कूल प्रशासन जो कि एक तरीके से बच्चों का अभिभावक होता है और जो टीचर उनके मार्गदर्शक होते हैं। जो समाजसेवी कार्यक्रम आयोजित करते हैं और जो जिला प्रशासन जिस पर कि सभी प्रकार और सभी तरफ से सुचारू रूप से जनजीवन चलाने की जिम्मेदारी होती है। वो इतने कठोर और लापरवाह कैसे हो जाते हैं कि खुद तो सर्दी-गर्मी और बरसात से बचाव का इंतजाम करते हैं और बच्चों को तेज धूप और सर्द हवाओं को झेलने को मजबूर करते हैं। जहां ना तो उनके खाने और पीने की ही कोई उचित व्यवस्था होती है। आश्चर्यजनक बात है कि 1-2 घंटे चलने वाला कार्यक्रम कई-कई घंटे लेट हो जाता है और बच्चे तड़पते रहते हैं। मुझे ये बात समझ नहीं आती कि स्कूल प्रशासन की अभिभावक होने की जिम्मेदारी, समाजसेवियों का समाजसेवा पन, प्रशासन की प्रशासनिक जिम्मेदारी, उस समय क्यों नहीं जागती है कि जब बच्चों को किसी कार्यक्रम में बुलाने की बात उठती है या वो अपनी आंखों से बच्चों को तड़पता हुआ देखते हैं।
मेरे मन में एक ही प्रश्न उठता है कि क्या सारे के सारे स्वार्थी और ढकोसले बाज हैं। मेरा तो ये मानना है कि बच्चों को केवल स्कूल के कार्यक्रमों या राष्ट्रीय पर्व जैसे आयोजनों में भाग लेने तक ही सीमित रहना चाहिए और इस तरीके के आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जो कि अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए बच्चों का बंधुआ मजदूरों की तरह उपयोग करते हैं। मेरा सभी सामाजिक संगठनों, स्कूल के प्रिसिंपलों और जिला प्रशासन से अनुरोध है कि नौनिहालों को बंधुआ मजदूर बनाने से रोकने के लिए उचित कदम उठाएं। साथ ही ये आग्रह भी है कि अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन व जिला प्रशासन से साफ शब्दों में कह देना चाहिए कि उनके नौनिहालों का इस तरीके से उपयोग ना किया जाए। अगर कोई इसके बाद भी ना माने तो न्यायालय की शरण लेनी चाहिए। मेरे अनुसार ये बच्चों के प्रति एक जघन्य अपराध है। अगर आप मेरी बात से सहमत हैं तो इस ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

सोमवार, 9 सितंबर 2013

पर्यावरण संरक्षण के लिए बने सख्त और प्रभावी कानून

वन्यजीव पर्यावरण और समाज को चलाने में महत्वपूर्ण योगदान रखते हैं। आज जिस तेजी से मनुष्य शाकाहार की प्रवृत्ति छोड़कर मांसाहारी होता जा रहा है और जिस तरीके से शहरों में मांसाहार के रेस्टोरेंट और फूड चेन आए दिन खुलती जा रही हैं, उसी अनुपात में हमारे पर्यावरण के प्रहरी कहे जाने वाले पशु-पक्षी भी नदारद होते जा रहे हैं। अगर इसी रफ्तार से ये चलता रहा तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं कि जब हमारे पर्यावरण और आसपास से तमाम पशु-पक्षी ही गायब हो जाएं।
वैसे तो जीव-जंतुओं को सरंक्षण देने और इनकी संख्या में इजाफा कर पर्यावरण को अनुकूल दिशा देने के लिए काफी कायदे-कानून बनाए गए हैं। वहीं कई संस्थाएं और संगठन भी इस दिशा में जोर-शोर से काम कर रहे हैं। जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, ठीक उसी तरह से वन्य जीवों के संरक्षण के कानून और पर्यावरण आदि के द़ृष्टिकोण से ये बड़ा महत्वपूर्ण है। वहीं दूसरी ओर एक पहलू ये भी है कि जिस चीज पर रोक लगा दी जाती है उसे ही व्यापार जगत और कुछ लालची किस्म के लोग अपनी कमाई का जरिया बना लेते हैं।
एक ओर हम मांसाहार की नई-नई डिशों को पेश कर रहे हैं तो दूसरी ओर स्कूलों में मेंढक की चीर-फाड़ के जरिए जो बायोलोजी का ज्ञान दिया जाता था उसे प्रतिबंध कर दिया गया। ऐसा होने से आज लाखों छात्रों को प्रायोगिक परीक्षा से महरूम होना पड़ रहा है। इस देश की ये कैसी विडम्बना है कि टीवी पर रोज-रोज नए रेस्टोरेंट मांसाहार परोसते नजर आते हैं। वहीं नए-नए मांसाहारी होटल और रेस्त्रां खुलते हैं जिनकी रसोई में मांसाहार पकता है। इसके अलावा कई बड़े शहरों में ऐसे रेस्टोरेंट मिल जाएंगे जो कि मांसाहार के लिए ही प्रसिद्ध है, इन्हीं में से एक रेस्टोरेंट है केएफसी। आज इस रेस्टोरेंट की चेन हर शहर में मिल जाएगी और धीरे-धीरे इस रेस्टोरेंट में आने वालों की संख्या में रोज इजाफा हो रहा है।
सरकार की इस तरह की दोगली नीतियों का ये तो मात्र एक उदाहरण है। इनसे ये समझ आना काफी मुश्किल होता है कि सरकार वास्तव में वन्य जीवों को संरक्षण देना चाहती है या अपनी कमाई का माध्यम बनाना चाहती है। यदि गौर से देखें तो जितनी भी दवाइयों का परीक्षण या बीमारियों का टेस्ट होता है वो सबसे पहले चूहों पर ही किया जाता है। हमारी वानर सेना, जिसे कि हम अपने पूर्वजों का दर्जा देते हैं। आज वो जिस तरीके से उत्पात मचाते हैं और जनहानि के साथ संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाते हैं और हम मूक दर्शक बने देखते रहते हैं।
यहां सोचने का प्रश्न ये है कि पर्यावरण के लिए संरक्षण भी जरूरी है और प्रेक्टिकल ज्ञान देना भी। अत: सरकार को चाहिए कि मांसाहारी खाने पर प्रतिांध लगाए और शाकाहार को बढ़ावा दे। दूसरी तरफ बायोलोजी का ज्ञान पाने वाले छात्रों को प्रेक्टिकल ज्ञान देने की उपलधता भी सुनिश्चित कराए।



रविवार, 8 सितंबर 2013

आगरा पर फिल्म बनाएं प्रकाश झा


मुगलकालीन बादशाह अकबर ने आगरा को राजधानी ऐसे ही नहीं चुना था। काफी पारखी नजरों से उसके नवरत्नों ने आगरा को राजधानी चुना। 20वीं सदी में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सुपुत्र संजय गांधी भी आगरा को देश की राजधानी का दर्जा देने को तत्पर थे और तो और शाहजहां ने भी अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल का निर्माण कर आगरा के लोगों को दोनों हाथों से व हर प्रकार से नेमत लुटाई थी, लेकिन कहते हैं ना कि भाग्य से ज्यादा या समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिला। ये मुहावरा आगरा की जनता पर पूरी तरह से लागू होता है। वहीं, उसने अपने सामने ही अपने शहर के नाम पर दूसरे को फलता-फूलता देखा है। ऐसे में मन मसोस कर रह जाने के अलावा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचता। ये कहावत भी पूरी तरह से राजनीतिक दलों व प्रशासनिक अधिकारियों पर फिट रहती है। भगवान देता है तो आगरा भेज देता है। आप पिछले तीन दशकों को देखें तो हर पार्टी ने आगरा का इमोशनली इस्तेमाल किया और अपनी उपवन को हर तरीके से फलीभूत किया। चाहे वो राजनीतिक दलों की मीटिंग हो या राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन अथवा देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की योजना। सभी में मेरे शहर के नाम पर मेरे ही शहर के लोगों को सब्जबाग दिखाए और फाइलों व फाइव स्टार होटलों में जमकर शाहखर्ची की। आज फिर मेरे मन को काफी धक्का लगा कि जब आगरे के सभी प्रतिष्ठित न्यूज पेपर्स ने अपने-अपने तरीकों से जनता के दर्द को और माननीयों की खुशामदी को अपने शदों में पिरोया तो मेरा भी मन विचलित हो सोचने पर मजबूर हो गया कि कहां तो न्यूज पेपर्स की छोटी-छोटी बात माननीय और मंत्रियों को उनके अफसर मार्क करके दिखाते हैं और वो किस तरह उसका राजनीतिक लाभ लेते हैं। उस पर भी वो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन मुद्दों को जनता के मध्य ले जाकर अपना फायदा उठा लेते हैं। कहां तो पिछले 30 दिन से शहर के सभी न्यूज पेपर्स सड़कों की खस्ताहाल पर ढोल पीट रहे थे। प्रशासन तो छोड़िए उसके कद्दावर मंत्री और अन्य मंत्रियों पर भी कोई असर नहीं हो रहा था। हाल फिलहाल के दिनों में 24 घंटों के भीतर ही अलाद्दीन के चिराग की तरह हर तरफ ना केवल सड़क का निर्माण हो रहा है, जोरदार सफाई व्यवस्था भी हो रही है। ये अलग मुद्दा है कि जहां से हमारे माननीय गुजरेंगे वो स्थान साफ-सुथरा और चमचमाता हुआ रहेगा और उसके 10 कदम दूर की कॉलोनियों में से गुजरने पर आपको कन्नौज के इत्र का सहारा लेना होगा। साथ ही अपने कमर व शरीर के दर्द को दूर करने के लिए फिजियो की शरण। आगरा की सड़कों ने मैकेनिकों को रोजगार दे रखा है। निश्चित रूप से वो गैरेज मालिक उनको हृदय से धन्यवाद देते हैं। प्रश्न ये उठा कि अगर रातों-रात हर काम हो सकते हैं और अगर उनमें धन का भी अभाव ना हो तो न्यूजपेपर्स में जो हम न्यूज पढ़ते हैं कि फलां फाइल कई विभागों के चक्कर खाकर कहीं खो गई और शासन को प्रस्ताव भेज दिया है। आज तेज धूप तो आज पानी गिर रहा है। ये सारे जुमले इस वक्त क्यों नहीं सामने आ रहे। क्या आगरे की जनता इतनी सीधी है कि वो ये भी नहीं जानती कि जो लाभ आगरा को मिलना चाहिए वो लाभ फाइलों में मिलकर ए से लेकर जेड़ तक की पॉकेट भर रहा है।
मेरे आगरे के जागरूक नागरिकों व प्रमुख न्यूज पेपर्स से आग्रह है कि आगरा के नाम पर आने वाली तमाम सुविधाएं का फ्लॉप फिल्मों की तरह डिब्बाबंद होती रहेंगी क्यों ना वो अपने प्रयास से सत्याग्रह या 3 इडियट जैसी फिल्मों या बड़ौदा जैसे शहर की तरह आगरा को सफलता संपन्नता दिलाने में सहयोग प्रदान करें। मेरा आग्रह फिल्म निर्देशक प्रकाश झा से भी है कि वो आसाराम जैसे पापी पर फिल्म न बनाकर अकबर की राजधानी और विश्व में ताजमहल के लिए जाने जाने वाले शहर पर फिल्म बनाकर आगरा के लोगों पर उपकार करे और धन भी कमाए।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

कारोबारी संत

पिछले 10-15 दिनों से आसाराम जी को लेकर अखबार व इलेक्ट्रॉनिक चैनल 24 घंटे खबरें व विशेष पैकेज चला रहे हैं। उनको जेल भेजे जाने के बाद आज कोई भी जगह या क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है कि जहां उन्हें लेकर चर्चाएं ना हो रही हों। चाहे वो स्कूल, मॉर्निंग वॉक, क्लब हो या मंदिर में धर्म का कार्यक्रम।  उम्र का भी कोई सरोकार नहीं है। 15 से लेकर 80 साल के बुजुर्ग भी उनके बारे में बात कर रहे हैं और मान रहे हैं कि अगर वो दोषी हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में तीन बातें मुख्य हैं। 1. क्या आसाराम इस उम्र में सेक्स करने में सक्षम हैं। 2. सभी बाबा इंडस्ट्री से जुड़े लोगों बाबाओं का यही हाल है और 3.बाबा व धर्म के नाम पर लोगों को लूट रहे लोगों ने देश के धन्नासेठ व टायकून कहे जाने वाले टाटा-बिड़ला जैसे कारोबारियों को भी पछाड़ दिया है। मैंने भी इस पर गौर फरमाया और पाया कि वास्तव में तीनों चीजें काफी चिंतनीय हैं। व्यापारी वर्ग से नाता रखने के नाते सबसे पहले मैंने इनके कारोबार और वैभव पर चिंतन करना शुरू किया। जब आंख व दिमाग दौड़ाया तो पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई और टाटा-बिड़ला जैसा कोई भी नामी उद्योगपति इन बाबाओं के आगे बौना नजर आने लगा। ऐसा इसलिए क्योंकि इन बाबाओं का कारोबार ‘हरद लगे ना फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा’ की तर्ज पर दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। आप भी गौर फरमाइए कि मैं उद्योगपति और बाबा इंडस्ट्री की जो तुलना कर रहा हूं अगर आपको सही लगे तो आप अपने विचार अवश्य इस बारे में बाताएं। व्यापार या उद्योग छोटा हो अथवा बाड़ा, किसी को भी करने के लिए सूद पर पैसा लेना होता है। इन बाबाओं के पास तो बिना ब्याज का पैसा आता है और उसे लगाने के लिए चाहे 10 गुणा 10 की दुकान खरीदने या 3 बीघे का फैक्ट्री का प्लॉट खरीदना हो। इनके पास तो कब्जाई  हुई हजारों बीघा जमीन होती है। फैक्ट्री में शेड डालने के लिए जहां व्यवसायी को अपनी जमा-पूंजी निकालनी होती है। वहीं बाबा व चतुर संत व्यापारी वर्ग को भ्रमजाल में फांसकर उनके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से अपने वैभव और विलासिता का भवन खड़ा कर लेता है। एक व्यापारी अपना माल बेचने के लिए तरह-तरह के जतन के साथ ही यार-दोस्तों से खरीदने की मनुहार करता है। वहीं वह ग्राहक की ठोड़ी पर हाथ डालता है और संत बाबा कारोबारियों का माल तो उनके भक्त खुद ही दुकान सजाकर बेचते हैं। उनके व्यवसाय में ना तो कांस्टेबल डंडा करता है और ना छुटभैये नेता चौथ वसूलते हैं, जबकि उल्टे चौथ वसूलने वाले ही इन संतों को चौथ और काले धन का पैसा दे जाते हैं। व्यापारी पर लगने वाले दर्जनों डिपार्टमेंट जैसे व्यापार कर, इनकम टैक्स, उत्पाद शुल्क, फूड एंड सप्लाई मैनेजमेंट, निगम आदि सहित जो तमाम डिपार्टमेंट हैं, ना तो इन संतों को छूते हैं और ना ही इन विभागों को दिया जाने वाला टैक्स बाबा जमा कराते हैं। दरअसल, ये सारे टैक्स तो इन संतों के नेट प्रॉफिट में जुड़ता है और जो काम पूरा होने पर विभागों में रिश्वत देनी होती है वो इन संतों का महा प्रोफिट होता है, क्योंकि इससे उनका दूर-दूर तलक कोई वास्ता ही नहीं होता। ऐसा कौनसा बाबा है जो कि आज अपना व्यापार नहीं चला रहा हो। अभी तक के इनके प्रमुख व्यापार सौंदर्य प्रसाधन, आयुर्वेदिक दवाइयां, स्कूल-कॉलेज, रिसर्च सेंटर, धार्मिक व प्रवचनों की सीडी की बिक्री और धर्मशाला-आश्रम के रूप में खड़ी इनकी होटल इंडस्ट्री।
लेकिन मैंने इन पर गौर फरमाया कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक दिमाग दौड़ाया तो इनका एक और व्यापार सामने निकलकर आया जो कि दिनों-दिन फल-फूल रहा है और वह है अय्याशी करना, जमीन हथियाना, प्रशासन व राजनीतिक दलों से मिलीभगत व भक्त के काले धन को अपने प्रचार-प्रसार व अपने काले धन को भक्त के व्यापार में लगाना आदि-आदि। साथ ही अपने लिए सोने-चांदी के पलंग का निर्माण करवाना। इस सारे जतनों से इनकी दौलत अकूत होती जाती है।
ऐसे में सोचिए व्यापारी वर्ग कितना आहत होता है कि जब सभी समस्याओं से लड़कर वह दो से पांच लाख ही कमा पाता है और दिन में 10 जगह और 10 बार उसे खुद को चोर सुनना पड़ता है। वहीं बाबा लोग सीना ठोककर चोरी करते हैं और विलासिता पूर्ण जीवन जीते हैं। वहीं देश की आर्थिक मजबूती के लिए व्यापारी वर्ग जो कि दिन-रात खटता है और महीने में 10 से 15 दिन तक एक टाइम रोटी खाकर गुजारा करता है।
मैं भारत के समस्त उद्योग व व्यापार में लगे हुए व्यापारी भाइयों चाहे वो चाय बेचने वाला हो या टाटा-अंबानी  जैसा नामी उद्योगपति। सभी को सलाम करता हूं कि ईश्वर ने हमें इस तरीके से काम करने की शक्ति प्रदान की। सरस्वती मां से यही प्रार्थना है कि हे सरस्वती मां हम व्यापारियों को सदुद्धि दे और इन बाबाओं की इंडस्ट्री के आगे ईमानदारी से खड़े रहने की ताकत दे।


सोमवार, 2 सितंबर 2013

नेताओं को पुलिस सुरक्षा जर्रुरत या सत्ता की हनक

देखिए ये लोकतंत्र की कैसी विडंबना है कि इसमें जनता के द्वारा चुने गए लोग, प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक दलों के बड़े पदाधिकारी जो कि खुद को जनसेवक कहलाते हैं। ऐसे लोगों में खुद को खास प्रदर्शित करने की सबसे ज्यादा भूख रहती है। इसका खामियाजा जनता को उठना पड़ता है और उसे अपराधियों और अपराध से दो-चार होना पड़ता है।
आजादी के बाद का इतिहास खंगाले तो ये चीज गौर करने लायक है कि उस दौर के जो जनप्रतिनिधि हुआ करते थे, जिन्होंने की अपनी जान की परवाह किए बिना हमें आजादी दिलाई थी, उनकी जान को हमेशा खतरा रहता था। सादा जीवन और उच्च विचार के सूत्र पर चलने वाले हमारे वो महान नायक आडंबर से कोसों दूर रहते थे। अगर उन्होंने भी ऐसा किया होता तो शायद हमें आजाद होने में काफी समय लगता और वो देशभक्त भी नहीं कहला पाते।
भारतीय संविधान के मुताबिक आम जन को सुरक्षा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है। इसी व्यवस्था के तहत प्रत्येक राज्य में पुलिस बल का गठन किया गया। वैसे तो हमें ये जानकारी है कि रौब गांठने और सत्ता की हनक दिखाने के लिए ही आज के नेता और मंत्रियों के संग कई पुलिसकर्मी उनकी सेवा में तैनात रहते हैं। ऐसे में आमजन की सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मियों की संख्या कम हो जाती है। वैसे ही हमारे राज्य की पुलिस स्टॉफ की कमी से जूझ रही है और नेताओं की चाकरी और वीआईपी ड्यूटी के कारण वह अपना मुख्य काम जो कि जनता की सेवा करना है वह नहीं कर पाती है। वैसे आंकड़ों पर गौर करें तो हमारे देश में जो पुलिस और पब्लिक का रेश्यो है वो कई देशों के अनुपात में कम है। वहीं पुलिस को उसके मुख्य काम से हटाकर दूसरे कामों में लगा देने से चोरी, अपहरण और अन्य घटनाओं में इजाफा होता है। फिर इन घटनाओं का खुलासा नहीं होता है तो भी इसके लिए हम पुलिस को ही जिम्मेदार ठहराते हैं, जबकि वह तो हुक्मरानों के आदेशों को पूरा करने में ही पूरी हो जाती है।

खाद्य सुरक्षा बिल :सरकार की मजबूरी या दरियादिली


देश की ये कितनी बड़ी विडंबना है कि आजादी के 65 साल गुजरने के बाद भी आज भारत वर्ष जो कि कभी कृषि प्रधान देश कहलाता था और जहां अनाज के प्रचुर भंडार थे। जहां तक मुझे याद है या मेरी समझ मेरा साथ दे रही है तो भारत के कृषि प्रधान देश रहने के दौरान शायद ही ऐसा किस्सा सुनने को मिला हो कि देश का कोई नागरिक कभी भूखा सोया हो। उसे किसी ना किसी तरीके से खाने के लिए दो जून की रोटी या कंद-मूल, फल की व्यवस्था हो जाती थी। ये व्यवस्था चाहे उसके स्वयं के द्वारा की गई हो या समाज के प्रधान व धनाढ्य लोगों अथवा प्रकृति के द्वारा। आज राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, विकास के नाम पर राजनीतिक भ्रष्टाचार से शासक द्वारा जनता को दो जून की रोटी मुहैया कराने का काम कहीं पीछे छूट सा गया है और आज खाद्य सुरक्षा राजनीतिक दलों के लिए एक मुद्दा बन गया है। आज हालात ये है कि भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी के दौर से गुजर रहा है। हमारे देश में जिस तरीके से आर्थिक नीतियां लागू हो रही हैं और  राजनीतिक लाभ लेने के लिए जिस तरीके से अमीर और गरीब के बीच खाई खींची जा रही है। विकास के नाम पर खेतों को खत्म किया जा रहा है और जिस प्रकार से देश में भ्रष्टाचार दिनों-दिन सुरसा की तरह से बढ़ रहा है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की ओर से जो खाद्य सुरक्षा बिल लाया गया है। उसने हमें सोचने को विवश कर दिया है कि पिछले करीब चार सालों से सोई हुई सरकार ने आनन-फानन में ये विधेयक लाकर केवल अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध किया है। यहां सोचने वाली बात ये है कि क्या ऐसा करना सरकार की सुशासन की नीति है या कुछ और। सरकार प्रत्येक व्यक्ति को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने का मन बना रही है और इसके लिए लोकसभा में जो बिल लाई है उसके लिए वो निश्चित रूप से बधाई की पात्र है, लेकिन कुछ ऐसे प्रश्न मन में कौंध रहे हैं, जिन पर कि चिंतन करना चाहिए।
एक तरफ कश्मीर और दक्षिण भारत में सस्ते टीवी और चावल बांटे जा रहे हैं तो बिहार व उत्तर प्रदेश जहां पर सबसे ज्यादा भुखमरी की स्थिति है और उनका (केंद्र) राजनीतिक हस्तक्षेप भी कम है। आंकड़ों की बाजीगरी से सरकार ये दिखाकर कि वो हर गरीब को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराएगी अपनी पीठ सरकार खुद थपथपा रही है। यहां दूसरा सवाल ये भी उठता है कि अगर हम भारतीय मानसिकता के अनुसार सोचें तो सरकार का ये महत्वाकांक्षी कदम जिस पर करीब सालाना सवा लाख रुपये का खर्च आना है वो वास्तव में आंकड़ों का हेरफेर है या कुछ और। क्या ये खाना उसके असली हकदार तक पहुंचेगा या सरकारी तंत्र अथवा लालाओं की तिजोरी भरेगा।
वहीं भारतीय जनता पार्टी जो कि प्रमुख विपक्षी दल है। एक ओर जहां वो सरकार की आर्थिक नीतियों को कोस रही है तो वहीं वह दूसरी ओर वोटों की राजनीति के तहत खाद्य सुरक्षा बिल, जिससे कि सरकार पर सब्सिडी  का बोझ बढ़ेगा, उसी का समर्थन कर रही है। और तो और उत्तर प्रदेश व बिहार को ही खाद्य सुरक्षा बिल से सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा, लेकिन इन सूबों के मुखिया अल्पसंख्यकों के प्यार या यों कहें कि वोटों की राजनीति के चलते बिल की आलोचना से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। वैसे जिम्मेदार भारतीय और सरकार के साथ विपक्ष की भी ये जिम्मेदारी है कि चाहे किसी भी परिस्थिति या आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हो. साथ यदि हम ईमानदारी से पात्र व्यक्ति को उसका हक नहीं पहुंचाएंगे या दिलाएंगे तो ऐसा करके हम वंचित वर्ग को भुखमरी की खाई में झोंक देंगे और भारत को ज्यादा बड़े गड्ढे में गिरने से नहीं बचा पाएंगे।

रविवार, 1 सितंबर 2013

आज कितने सार्थक हैं खेल दिवस के कार्यक्रम

 देश की माटी में हमेशा से एक उर्वरा किस्म की तासीर रही है, जिसने कि हमें ध्यानचंद, दारासिंह और वीनू माकंड जैसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी दिए हैं। ये माटी की ही तासीर का कमाल है कि यहां के पहलवानों ने मिट्टी को ही बदन पर लपेटकर कुश्ती के तमाम दांवपेच सीखे हैं। अपनी प्रतिभा से उन्होंने दुनियाभर में अपना और देश का नाम रोशन किया। अगर देखा जाए तो खेल के प्रति लगन व हमारे खिलाड़ियों की शक्ति लगान फिल्म के जरिए अच्छे से समझी जा सकती है। आज विकास की राह में खेल के मैदान में खत्म होते जा रहे हैं। अभी 29 अगस्त को खेल दिवस होने के बावजूद खिलाड़ियों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दिया। आज तमाम आधुनिक सेवाओं से लैस होकर महानगरों में खेल के मैदान (स्टेडियम) तो बन गए हैं और उनमें एक बहुत बड़ी सरकारी फौज भी तैनात है, लेकिन उनकी भावना ना तो खेल और खिलाड़ियों के साथ है। खेल दिवस के दिन भी जो कार्यक्रम होने थे और जिन्हें इस महत्वपूर्ण दिन मनाया जाना था, वो मात्र औपचारिक रस्म या खानापूर्ति तक ही सिमटकर रह गए। आज खेल जगत में खेल भावना का स्थान राजनीतिक भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद की भेंट चढ़ गया है। ऐसे समय में विश्वस्तरीय प्रतियोगिता में हमेशा बेइज्जती का सामना करना पड़ता है, जाकि भारत में जितनी जमीन और जनसंख्या है और जो मानव श्रम उपलध है। अगर इन सभी को सही तरीके से निखारा जाए तो हमारे यहां करीब दो दर्जन से अधिक खेल ऐसे हैं, जिसमें कि हमारे खिलाड़ी हीरे जड़ित पुरस्कार भी ला सकते हैं।
अगर आज जरा गौर फरमाएं तो हमारे यहां गांव का हर व्यक्ति जो कि ढेला फेंकता है। उसकी बराबर क्षमता से किसी भी देश का व्यक्ति ऐसा कतई नहीं कर सकता।
दूसरा उदाहरण हमारे वे खिलाड़ी हैं जो गांवों केागीचों में पत्थर फेंककर आम तोड़ते हैं। ऐसे व्यक्ति एक ही बार में एक निशाने से 10-10 आम तोड़ पाने में सक्षम हैं। ये तो छोड़िए अगर आप कभी उनकी साइकिल पर बैठ जाएं तो उनकी साइकिल हवा से बातें करती हुई दिखाई देती है। यहां प्रश्न ये उठता है कि इतनी क्षमताओं के बाद भी हम क्यों फिसड्डी हैं। बड़ा सीधा सा प्रश्न है। दूसरे देशों में खेलों को प्रोफेशन माना गया है और जीवनपर्यंत सरकार उस खिलाड़ी के परिवार को अपनी जिम्मेदारी मानकर उसके जीवन यापन की व्यवस्था करती है। हमारे यहां दिखावे के रूप में खिलाड़ी को प्रोत्साहन की बात तो की जाती है और सम्मान के रूप में उसे सर्टिफिकेट व तमगा देकर इतिश्री समझ लेते हैं। आज हमारे देश के कम से कम तीन दर्जन ऐसे खिलाड़ी सामने आए हैं, जो कि सड़क पर अपने मेडलों की नुमाइश पर या उन्हें बेचकर अपने परिवार की दो जून की रोटी की व्यवस्था में जुटे हैं। वो अपने इष्टमित्रों व परिजनों से कहते हैं कि जीवन में सब कुछ करना, लेकिन खिलाड़ी मत बनना। भले ही भिखारी बन जाना। हम खेल दिवस के मौके पर ही उन खिलाड़ियों को ना तो याद करते हैं और ना ही उनके जीवन और खेल की प्रतिभाओं को आने वाले खिलाड़ियों को किस्से सुनाकर उनमें उत्साह का संचार करते हैं । शहर के ही चार खिलाड़ी या संस्थाएं, (जिन्हें कि समाजसेवी कहलाने का कोई भी मौका चाहिए) ऐसे लोग और संस्थाएं चंद खेल अधिकारियों के संग फोटो खिंचाकर बिना किसी प्लानिंग व विचारधारा के अगले दिन के अखबार की सुखियां बनते हैं। ऐसे में जो सच्चा खिलाड़ी या उभरती हुई प्रतिभाएं होती हैं। अखबार में अपने से कमतर खिलाड़ियों की छपी हुई फोटो देखकर उनका मनोबल गिर जाता है और उनकी आत्मा भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार को कोसती है। किसी भी विशेष दिवस की सार्थकता तभी होती है कि जब उस दिन को वैभवपूर्ण तरीके से और उस क्षेत्र के सम्मानीय लोगों के साथ गरिमापूर्ण तरीके के साथ मनाया जाए। कई खिलाड़ी तो दबी जुबान में कहते भी हैं कि कुछ मठाधीशों, खेल संगठनों के प्रमुख अधिकारी तो हमारा खून चूस रहे हैं। ये जब तक अपने पदों से नहीं हटेंगे और सरकार के साथ व्यापार जगत के लोग हमें सहयोग नहीं करेंगे तब तक भारत को खेल जगत में अपना सम्मानजनक स्थान बना पाना मुश्किल रहेगा साथ ही इस दिवस को मनाना हाकी के पुरोधा स्व. दादा ध्यानचंद की आत्मा को कष्ट पहुंचाना होगा। खेल केवल खेल जगत में अपना नाम रोशन करने की वस्तु नहीं है। यहां पं. जवाहर लाल नेहरु ने लाल किले से अपने पहले भाषण में जो बात कही थी वो सच साबित होती नजर आती है। उन्होंने कहा था कि भारत में जितने मैंदान हैं, उनमें अगर हम उतर जाएं तो हमें अस्पताल जाने की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी। हमें अस्पताल नहीं खेल मैदान चाहिए। जिस देश के प्रधानमंत्री की ऐसी भावना थी, सोचिए जिस तरीके से खेल दिवस को महज रस्म अदायगी की तरह मनाया गया है, उससे उनकी आत्मा कितनी कचोट रही होगी।
लेखक का सभी खेल प्रेमियों से आग्रह है कि वो खेल को खेल भावना की तरह खेलें और अपने दम पर साथियों के साथ मिलकर ऐसी खेल भावना व संगठन तैयार करें कि देश की 125 करोड़ की जनता को अस्पताल की आवश्यकता ही ना पड़े। विश्व में होने वाली स्पर्धाओं में सर्वाधिक पदक प्राप्त कर देश का नाम रोशन करें।