रविवार, 15 सितंबर 2013

अतुल्य भारत कब बनेगा अखंड भारत


कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। पहले मुगल शासकों ने हिंदू राजाओं का कत्लेआम कर उनके राज्यों पर कब्ज़ा कर लिया। ऐसा करके उन्होंने देश में आपसी वैमनस्यता के बीज बो दिए। उनके बाद आए अंग्रेजों ने भी किसी ना किसी तरह से फूट डालकर देश पर राज किया। सैकड़ों सालों की गुलामी के बाद हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजाद कराकर ऐसे प्यारे भारत की कल्पना की, कि जिसमें सौहार्द व आपसी तथा सर्वधर्म सम्मान का वातावरण तैयार किया, लेकिन आज सभी राजनीतिक लोग और कुछ ऐसे तत्व जो राज्य और देश में अशांति पैदा करने के लिए काम करते हैं, जिनके बदले उन्हें एक मोटी रकम मिलती है।
यहां ये प्रश्न उठता है कि ऐसे लोगों का दुष्कर्म उस राज्य और देश को पीछे छोड़ देता है। विकास की राह में, लेकिन आम जनता को व उसके परिवार को ऐसा जख्म दे जाता है, जो कि उसकी सात पुश्ते ना तो भूल पाती हैं और ना ही उबर पाती हैं। आम आदमी चाहे वो किसी धर्म, जाति का हो किसी भी राज्य का रहने वाला हो। जो आदमी अपने काम में मशरूफ रहकर दो जून की रोटी जुटाने में लगा रहता है उसका एक तो ये धर्म होता है और वो है कर्म। आज बहुत सारे प्रोफेशन और ऐसे कार्य हैं, जिसमें उस कार्य को पूरा करने के लिए एक पक्ष, एक समुदाय और दूसरे पक्ष व दूसरे समुदाय से है। परंतु कभी वो इस तरीके के झगड़े व विवाद में पड़ता हुआ दिखा है। इससे साफ जाहिर होता है कि चंद लोग अपने लाभ के लिए सिर्फ रोजगार या अन्य लोगों को अपने प्रभाव में ले लेते हैं कि वो आम आदमी उसके परिणाम से अपरिचित होकर उन लोगों की हाथों की कठपुतली बन जाता है और वैमनस्यता फैलाने के लिए जान की बाजी लगा देता है। आप चाहें वो धर्म के नाम पर या अन्याय हो (धार्मिक लोग या धर्माचार्य या सांप्रदायिक तनाव)। आज किसी भी घटना को सांप्रदायिक तनाव का रूप दे देते हैं और लाखों को दो जून की रोटी पाने के लिए मोहताज कर देते हैं। पिछली घटनाओं को अगर आप देखें तो सभी में आपको यही मिलेगा कि बच्चे आपस में खेल रहे थे और मोहल्लों में सांप्रदायिक दंगा हो गया। कहीं लाउडस्पीकर तेज बज रहा था तो उसके रोकने के लिए कहा गया और इस घटना ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। पिछले दस सालों मे प्रदेश में जिस तरीके से दंगे भड़क रहे हैं उससे आपसी खाई प्रतिदिन गहराती चली जा रही है। आप पिछले डेढ़ साल में अपने ही राज्य में 10-12 घटनाएं घटित होते देख चुके हैं। इससे राज्य सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा हो गया है। यहां सोचने का प्रश्न ये है कि हमारी सरकार ने इन घटनाओं को रोकने के लिए कभी ठोस कदम उठाए ही नहीं। हमारे यहां की एलआईयू कहां सोई रहती है घटना होने के पहले। घटना के बाद तो सारे राजनीतिक दल खुद को चमकाने के लिए जहर उगलने में लगे रहते हैं, जबकि कोई भी आवाम ऐसी कोई मांग नहीं करती है, ना ही ऐसा कोई कार्य करती है, जिससे कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हो। कोई भी पार्टी या सरकार अथवा प्रशासन और उस शहर की जनता इस बात को ना तो उठाती है और ना ही ध्यान देती है। प्रदेश में इतनी बड़ी तादाद में अवैध हथियारों का जखीरा रातों-रात कहां से आ जाता है और रातों-रात ही वो गायब भी हो जाता है।
आनन-फानन में प्रशासनिक अधिकारी को ट्रांसफर करने की जो प्रथा है उससे इस घटना को प्रशासनिक दोष कहकर जनता को गुमराह किया जाता है और नए अधिकारी को भेजकर अपने आप को राजनीतिक वोट देने वालों को ये बताने का प्रयास किया जाता है कि देखो हम आपके साथ हैं। हमारा ब्रजमंडल भी ऐसी घटनाओं से अछूता नहीं है। हाल में न्यूजपेपर्स में आगरा में भी इस तरीके की कई घटनाओं को सांप्रदायिक रूप देने की कोशिश की गई, लेकिन आगरा की जनता व प्रशासन की तत्परता से उन घटनाओं पर समय रहते रोक लग गई, लेकिन राज्य सरकार ने अफसरों का ट्रांसफर करके लोगों में ये संदेश दिया कि हम आपके साथ हैं।
मेरे एक कोसी के व्यवसायी मित्र ने कहा कि आज भी हमारे यहां बाजार सुचारू रूप से चालू नहीं हैं और व्यापार का पलायन हरियाणा व राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों में हो रहा है। रोजमर्रा के खाने-कमाने वाले लोगों के लिए काफी दयनीय स्थिति है। हाल ही मुजफ्फर दंगों के बाद प्रमुख न्यूजपेपर के पहले पेज पर एक लड़की का फोटो छपा है। उसके नीचे लिखा है कि मेरा कसूर क्या है। मेरे जेहन में एक बात उठती है कि बेटा इसमें तेरा या मेरा नहीं है। हमारा कसूर सिर्फ इतना है कि हम आम आदमी हैं। आम आदमी होते हुए भी हम दो जून की रोटी भी चैन से नहीं खा सकते हैं। ये घटना तो उन चंद लोगों की कारगुजारी का कसूर है कि जो हमें घाव देते हैं। उसका हमें व हमारी आने वाली पीढ़ियों को दर्द झेलना होगा। उस लड़की की बात दिल को छूते हुए ये विचार सोचने पर मजबूर कर देती है कि आम आदमी जो देर शाम तक अपनी रोटी कमाने की जुगत में लगा रहता है। उसका कसूर क्या है और उसे कब तक इस नई समस्या से मुक्ति मिलेगी और कब हमारा अतुल्य भारत अखंड भारत बन पाएगा।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

बच्चे मन के सच्चे.....

बच्चे मन के सच्चे, सारी जग की आंख के तारे.....

उपरोक्त गाने का अर्थ देखें और गौर करें तो मालूम होता है कि इसमें बचपन का कितना सजीव चित्रण किया गया है और ये नौनिहालों के प्रेम के प्रति जीवंत उदाहरण भी पेश करता है, लेकिन आज माता-पिता की आंख के तारों को स्कूल प्रशासन, जिला प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं ने अपने कार्यक्रमों को सफल और आकर्षित बनाने का एक जरिया बना लिया है। इन कार्यक्रमों में जिस तरीकों से नौनिहालों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे माता-पिता के हृदय को काफी दुख पहुंचता है। आप अक्सर न्यूज पेपर्स में पढ़ते और फोटो देखते होंगे कि निजी व सरकारी कार्यक्रमों में या अन्य किसी प्रकार के कार्यक्रमों में नौनिहालों का प्रदर्शन आवश्यक सा हो गया है। किसी भी स्कूल की रैली हो या कोई और प्रदर्शन वह इनके बिना अधूरा है। यहां एक वाक्ये का जिक्र करना उचित रहेगा, जिसे सुनकर आप उन नौनिहालों की दयनीय स्थिति का अंदाजा अच्छे से लगा सकेंगे। अभी सिने जगत की एक नामी अभिनेत्री ने एक नामचीन न्यूज चैनल के यमुना बचाओं कार्यक्रम में हिस्सा लेने आगरा आईं और इस कार्यक्रम में शहर के तमाम स्कूलों के बच्चे भी पर्यावरण बचाओ अभियान का हिस्सा बने।
काफी अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि 4-5 घंटे तक भूखे प्यासे नौनिहाल इस कार्यक्रम में बैठे रहे। एक ओर तो हम नौनिहालों को देश का भविष्य मानते हुए उन्हें भगवान का दर्जा देते हैं, वहीं, दूसरी ओर से नौनिहाल एक अभिनेत्री के इंतजार में घंटों धूप में बैठे रहे। आखिरकार वो क्षण भी आया कि जब अभिनेत्री आई भी और पांच मिनट के फोटो सेशन के बाद फुर्र हो गई। टीवी चैनल का कार्यक्रम भी हो गया और पांच मिनट में यमुना भी निर्मल हो गई। मुझे अभी तक ये समझ नहीं आया कि उस कार्यक्रम से किसे और क्या फायदा पहुंचा। दुनियाभर का भीड़-भड़क्का वहां जमा रहा। इसमें वहां दर्शक बने तमाम लोगों का समय भी खराब हुआ और जो नौनिहाल वहां आए थे, उनकी एक दिन की पढ़ाई ठप हुई सो अलग। वैसे ही कॉलेज और स्कूलों में साल भर में कितने दिन सही मायने में पढ़ाई होती है। ये किसी से भी छुपा हुआ नहीं है। इसके अलावा शहर में ही होने वाले कई कार्यक्रमों में सेलिब्रिटी के इंतजार में नौनिहालों को बेहोश होते हुए भी देखा है। बड़ा ताज्जुब होता है कि स्कूल प्रशासन जो कि एक तरीके से बच्चों का अभिभावक होता है और जो टीचर उनके मार्गदर्शक होते हैं। जो समाजसेवी कार्यक्रम आयोजित करते हैं और जो जिला प्रशासन जिस पर कि सभी प्रकार और सभी तरफ से सुचारू रूप से जनजीवन चलाने की जिम्मेदारी होती है। वो इतने कठोर और लापरवाह कैसे हो जाते हैं कि खुद तो सर्दी-गर्मी और बरसात से बचाव का इंतजाम करते हैं और बच्चों को तेज धूप और सर्द हवाओं को झेलने को मजबूर करते हैं। जहां ना तो उनके खाने और पीने की ही कोई उचित व्यवस्था होती है। आश्चर्यजनक बात है कि 1-2 घंटे चलने वाला कार्यक्रम कई-कई घंटे लेट हो जाता है और बच्चे तड़पते रहते हैं। मुझे ये बात समझ नहीं आती कि स्कूल प्रशासन की अभिभावक होने की जिम्मेदारी, समाजसेवियों का समाजसेवा पन, प्रशासन की प्रशासनिक जिम्मेदारी, उस समय क्यों नहीं जागती है कि जब बच्चों को किसी कार्यक्रम में बुलाने की बात उठती है या वो अपनी आंखों से बच्चों को तड़पता हुआ देखते हैं।
मेरे मन में एक ही प्रश्न उठता है कि क्या सारे के सारे स्वार्थी और ढकोसले बाज हैं। मेरा तो ये मानना है कि बच्चों को केवल स्कूल के कार्यक्रमों या राष्ट्रीय पर्व जैसे आयोजनों में भाग लेने तक ही सीमित रहना चाहिए और इस तरीके के आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जो कि अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए बच्चों का बंधुआ मजदूरों की तरह उपयोग करते हैं। मेरा सभी सामाजिक संगठनों, स्कूल के प्रिसिंपलों और जिला प्रशासन से अनुरोध है कि नौनिहालों को बंधुआ मजदूर बनाने से रोकने के लिए उचित कदम उठाएं। साथ ही ये आग्रह भी है कि अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन व जिला प्रशासन से साफ शब्दों में कह देना चाहिए कि उनके नौनिहालों का इस तरीके से उपयोग ना किया जाए। अगर कोई इसके बाद भी ना माने तो न्यायालय की शरण लेनी चाहिए। मेरे अनुसार ये बच्चों के प्रति एक जघन्य अपराध है। अगर आप मेरी बात से सहमत हैं तो इस ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

सोमवार, 9 सितंबर 2013

पर्यावरण संरक्षण के लिए बने सख्त और प्रभावी कानून

वन्यजीव पर्यावरण और समाज को चलाने में महत्वपूर्ण योगदान रखते हैं। आज जिस तेजी से मनुष्य शाकाहार की प्रवृत्ति छोड़कर मांसाहारी होता जा रहा है और जिस तरीके से शहरों में मांसाहार के रेस्टोरेंट और फूड चेन आए दिन खुलती जा रही हैं, उसी अनुपात में हमारे पर्यावरण के प्रहरी कहे जाने वाले पशु-पक्षी भी नदारद होते जा रहे हैं। अगर इसी रफ्तार से ये चलता रहा तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं कि जब हमारे पर्यावरण और आसपास से तमाम पशु-पक्षी ही गायब हो जाएं।
वैसे तो जीव-जंतुओं को सरंक्षण देने और इनकी संख्या में इजाफा कर पर्यावरण को अनुकूल दिशा देने के लिए काफी कायदे-कानून बनाए गए हैं। वहीं कई संस्थाएं और संगठन भी इस दिशा में जोर-शोर से काम कर रहे हैं। जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, ठीक उसी तरह से वन्य जीवों के संरक्षण के कानून और पर्यावरण आदि के द़ृष्टिकोण से ये बड़ा महत्वपूर्ण है। वहीं दूसरी ओर एक पहलू ये भी है कि जिस चीज पर रोक लगा दी जाती है उसे ही व्यापार जगत और कुछ लालची किस्म के लोग अपनी कमाई का जरिया बना लेते हैं।
एक ओर हम मांसाहार की नई-नई डिशों को पेश कर रहे हैं तो दूसरी ओर स्कूलों में मेंढक की चीर-फाड़ के जरिए जो बायोलोजी का ज्ञान दिया जाता था उसे प्रतिबंध कर दिया गया। ऐसा होने से आज लाखों छात्रों को प्रायोगिक परीक्षा से महरूम होना पड़ रहा है। इस देश की ये कैसी विडम्बना है कि टीवी पर रोज-रोज नए रेस्टोरेंट मांसाहार परोसते नजर आते हैं। वहीं नए-नए मांसाहारी होटल और रेस्त्रां खुलते हैं जिनकी रसोई में मांसाहार पकता है। इसके अलावा कई बड़े शहरों में ऐसे रेस्टोरेंट मिल जाएंगे जो कि मांसाहार के लिए ही प्रसिद्ध है, इन्हीं में से एक रेस्टोरेंट है केएफसी। आज इस रेस्टोरेंट की चेन हर शहर में मिल जाएगी और धीरे-धीरे इस रेस्टोरेंट में आने वालों की संख्या में रोज इजाफा हो रहा है।
सरकार की इस तरह की दोगली नीतियों का ये तो मात्र एक उदाहरण है। इनसे ये समझ आना काफी मुश्किल होता है कि सरकार वास्तव में वन्य जीवों को संरक्षण देना चाहती है या अपनी कमाई का माध्यम बनाना चाहती है। यदि गौर से देखें तो जितनी भी दवाइयों का परीक्षण या बीमारियों का टेस्ट होता है वो सबसे पहले चूहों पर ही किया जाता है। हमारी वानर सेना, जिसे कि हम अपने पूर्वजों का दर्जा देते हैं। आज वो जिस तरीके से उत्पात मचाते हैं और जनहानि के साथ संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाते हैं और हम मूक दर्शक बने देखते रहते हैं।
यहां सोचने का प्रश्न ये है कि पर्यावरण के लिए संरक्षण भी जरूरी है और प्रेक्टिकल ज्ञान देना भी। अत: सरकार को चाहिए कि मांसाहारी खाने पर प्रतिांध लगाए और शाकाहार को बढ़ावा दे। दूसरी तरफ बायोलोजी का ज्ञान पाने वाले छात्रों को प्रेक्टिकल ज्ञान देने की उपलधता भी सुनिश्चित कराए।



रविवार, 8 सितंबर 2013

आगरा पर फिल्म बनाएं प्रकाश झा


मुगलकालीन बादशाह अकबर ने आगरा को राजधानी ऐसे ही नहीं चुना था। काफी पारखी नजरों से उसके नवरत्नों ने आगरा को राजधानी चुना। 20वीं सदी में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सुपुत्र संजय गांधी भी आगरा को देश की राजधानी का दर्जा देने को तत्पर थे और तो और शाहजहां ने भी अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल का निर्माण कर आगरा के लोगों को दोनों हाथों से व हर प्रकार से नेमत लुटाई थी, लेकिन कहते हैं ना कि भाग्य से ज्यादा या समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिला। ये मुहावरा आगरा की जनता पर पूरी तरह से लागू होता है। वहीं, उसने अपने सामने ही अपने शहर के नाम पर दूसरे को फलता-फूलता देखा है। ऐसे में मन मसोस कर रह जाने के अलावा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचता। ये कहावत भी पूरी तरह से राजनीतिक दलों व प्रशासनिक अधिकारियों पर फिट रहती है। भगवान देता है तो आगरा भेज देता है। आप पिछले तीन दशकों को देखें तो हर पार्टी ने आगरा का इमोशनली इस्तेमाल किया और अपनी उपवन को हर तरीके से फलीभूत किया। चाहे वो राजनीतिक दलों की मीटिंग हो या राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन अथवा देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की योजना। सभी में मेरे शहर के नाम पर मेरे ही शहर के लोगों को सब्जबाग दिखाए और फाइलों व फाइव स्टार होटलों में जमकर शाहखर्ची की। आज फिर मेरे मन को काफी धक्का लगा कि जब आगरे के सभी प्रतिष्ठित न्यूज पेपर्स ने अपने-अपने तरीकों से जनता के दर्द को और माननीयों की खुशामदी को अपने शदों में पिरोया तो मेरा भी मन विचलित हो सोचने पर मजबूर हो गया कि कहां तो न्यूज पेपर्स की छोटी-छोटी बात माननीय और मंत्रियों को उनके अफसर मार्क करके दिखाते हैं और वो किस तरह उसका राजनीतिक लाभ लेते हैं। उस पर भी वो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन मुद्दों को जनता के मध्य ले जाकर अपना फायदा उठा लेते हैं। कहां तो पिछले 30 दिन से शहर के सभी न्यूज पेपर्स सड़कों की खस्ताहाल पर ढोल पीट रहे थे। प्रशासन तो छोड़िए उसके कद्दावर मंत्री और अन्य मंत्रियों पर भी कोई असर नहीं हो रहा था। हाल फिलहाल के दिनों में 24 घंटों के भीतर ही अलाद्दीन के चिराग की तरह हर तरफ ना केवल सड़क का निर्माण हो रहा है, जोरदार सफाई व्यवस्था भी हो रही है। ये अलग मुद्दा है कि जहां से हमारे माननीय गुजरेंगे वो स्थान साफ-सुथरा और चमचमाता हुआ रहेगा और उसके 10 कदम दूर की कॉलोनियों में से गुजरने पर आपको कन्नौज के इत्र का सहारा लेना होगा। साथ ही अपने कमर व शरीर के दर्द को दूर करने के लिए फिजियो की शरण। आगरा की सड़कों ने मैकेनिकों को रोजगार दे रखा है। निश्चित रूप से वो गैरेज मालिक उनको हृदय से धन्यवाद देते हैं। प्रश्न ये उठा कि अगर रातों-रात हर काम हो सकते हैं और अगर उनमें धन का भी अभाव ना हो तो न्यूजपेपर्स में जो हम न्यूज पढ़ते हैं कि फलां फाइल कई विभागों के चक्कर खाकर कहीं खो गई और शासन को प्रस्ताव भेज दिया है। आज तेज धूप तो आज पानी गिर रहा है। ये सारे जुमले इस वक्त क्यों नहीं सामने आ रहे। क्या आगरे की जनता इतनी सीधी है कि वो ये भी नहीं जानती कि जो लाभ आगरा को मिलना चाहिए वो लाभ फाइलों में मिलकर ए से लेकर जेड़ तक की पॉकेट भर रहा है।
मेरे आगरे के जागरूक नागरिकों व प्रमुख न्यूज पेपर्स से आग्रह है कि आगरा के नाम पर आने वाली तमाम सुविधाएं का फ्लॉप फिल्मों की तरह डिब्बाबंद होती रहेंगी क्यों ना वो अपने प्रयास से सत्याग्रह या 3 इडियट जैसी फिल्मों या बड़ौदा जैसे शहर की तरह आगरा को सफलता संपन्नता दिलाने में सहयोग प्रदान करें। मेरा आग्रह फिल्म निर्देशक प्रकाश झा से भी है कि वो आसाराम जैसे पापी पर फिल्म न बनाकर अकबर की राजधानी और विश्व में ताजमहल के लिए जाने जाने वाले शहर पर फिल्म बनाकर आगरा के लोगों पर उपकार करे और धन भी कमाए।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

कारोबारी संत

पिछले 10-15 दिनों से आसाराम जी को लेकर अखबार व इलेक्ट्रॉनिक चैनल 24 घंटे खबरें व विशेष पैकेज चला रहे हैं। उनको जेल भेजे जाने के बाद आज कोई भी जगह या क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है कि जहां उन्हें लेकर चर्चाएं ना हो रही हों। चाहे वो स्कूल, मॉर्निंग वॉक, क्लब हो या मंदिर में धर्म का कार्यक्रम।  उम्र का भी कोई सरोकार नहीं है। 15 से लेकर 80 साल के बुजुर्ग भी उनके बारे में बात कर रहे हैं और मान रहे हैं कि अगर वो दोषी हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में तीन बातें मुख्य हैं। 1. क्या आसाराम इस उम्र में सेक्स करने में सक्षम हैं। 2. सभी बाबा इंडस्ट्री से जुड़े लोगों बाबाओं का यही हाल है और 3.बाबा व धर्म के नाम पर लोगों को लूट रहे लोगों ने देश के धन्नासेठ व टायकून कहे जाने वाले टाटा-बिड़ला जैसे कारोबारियों को भी पछाड़ दिया है। मैंने भी इस पर गौर फरमाया और पाया कि वास्तव में तीनों चीजें काफी चिंतनीय हैं। व्यापारी वर्ग से नाता रखने के नाते सबसे पहले मैंने इनके कारोबार और वैभव पर चिंतन करना शुरू किया। जब आंख व दिमाग दौड़ाया तो पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई और टाटा-बिड़ला जैसा कोई भी नामी उद्योगपति इन बाबाओं के आगे बौना नजर आने लगा। ऐसा इसलिए क्योंकि इन बाबाओं का कारोबार ‘हरद लगे ना फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा’ की तर्ज पर दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। आप भी गौर फरमाइए कि मैं उद्योगपति और बाबा इंडस्ट्री की जो तुलना कर रहा हूं अगर आपको सही लगे तो आप अपने विचार अवश्य इस बारे में बाताएं। व्यापार या उद्योग छोटा हो अथवा बाड़ा, किसी को भी करने के लिए सूद पर पैसा लेना होता है। इन बाबाओं के पास तो बिना ब्याज का पैसा आता है और उसे लगाने के लिए चाहे 10 गुणा 10 की दुकान खरीदने या 3 बीघे का फैक्ट्री का प्लॉट खरीदना हो। इनके पास तो कब्जाई  हुई हजारों बीघा जमीन होती है। फैक्ट्री में शेड डालने के लिए जहां व्यवसायी को अपनी जमा-पूंजी निकालनी होती है। वहीं बाबा व चतुर संत व्यापारी वर्ग को भ्रमजाल में फांसकर उनके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से अपने वैभव और विलासिता का भवन खड़ा कर लेता है। एक व्यापारी अपना माल बेचने के लिए तरह-तरह के जतन के साथ ही यार-दोस्तों से खरीदने की मनुहार करता है। वहीं वह ग्राहक की ठोड़ी पर हाथ डालता है और संत बाबा कारोबारियों का माल तो उनके भक्त खुद ही दुकान सजाकर बेचते हैं। उनके व्यवसाय में ना तो कांस्टेबल डंडा करता है और ना छुटभैये नेता चौथ वसूलते हैं, जबकि उल्टे चौथ वसूलने वाले ही इन संतों को चौथ और काले धन का पैसा दे जाते हैं। व्यापारी पर लगने वाले दर्जनों डिपार्टमेंट जैसे व्यापार कर, इनकम टैक्स, उत्पाद शुल्क, फूड एंड सप्लाई मैनेजमेंट, निगम आदि सहित जो तमाम डिपार्टमेंट हैं, ना तो इन संतों को छूते हैं और ना ही इन विभागों को दिया जाने वाला टैक्स बाबा जमा कराते हैं। दरअसल, ये सारे टैक्स तो इन संतों के नेट प्रॉफिट में जुड़ता है और जो काम पूरा होने पर विभागों में रिश्वत देनी होती है वो इन संतों का महा प्रोफिट होता है, क्योंकि इससे उनका दूर-दूर तलक कोई वास्ता ही नहीं होता। ऐसा कौनसा बाबा है जो कि आज अपना व्यापार नहीं चला रहा हो। अभी तक के इनके प्रमुख व्यापार सौंदर्य प्रसाधन, आयुर्वेदिक दवाइयां, स्कूल-कॉलेज, रिसर्च सेंटर, धार्मिक व प्रवचनों की सीडी की बिक्री और धर्मशाला-आश्रम के रूप में खड़ी इनकी होटल इंडस्ट्री।
लेकिन मैंने इन पर गौर फरमाया कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक दिमाग दौड़ाया तो इनका एक और व्यापार सामने निकलकर आया जो कि दिनों-दिन फल-फूल रहा है और वह है अय्याशी करना, जमीन हथियाना, प्रशासन व राजनीतिक दलों से मिलीभगत व भक्त के काले धन को अपने प्रचार-प्रसार व अपने काले धन को भक्त के व्यापार में लगाना आदि-आदि। साथ ही अपने लिए सोने-चांदी के पलंग का निर्माण करवाना। इस सारे जतनों से इनकी दौलत अकूत होती जाती है।
ऐसे में सोचिए व्यापारी वर्ग कितना आहत होता है कि जब सभी समस्याओं से लड़कर वह दो से पांच लाख ही कमा पाता है और दिन में 10 जगह और 10 बार उसे खुद को चोर सुनना पड़ता है। वहीं बाबा लोग सीना ठोककर चोरी करते हैं और विलासिता पूर्ण जीवन जीते हैं। वहीं देश की आर्थिक मजबूती के लिए व्यापारी वर्ग जो कि दिन-रात खटता है और महीने में 10 से 15 दिन तक एक टाइम रोटी खाकर गुजारा करता है।
मैं भारत के समस्त उद्योग व व्यापार में लगे हुए व्यापारी भाइयों चाहे वो चाय बेचने वाला हो या टाटा-अंबानी  जैसा नामी उद्योगपति। सभी को सलाम करता हूं कि ईश्वर ने हमें इस तरीके से काम करने की शक्ति प्रदान की। सरस्वती मां से यही प्रार्थना है कि हे सरस्वती मां हम व्यापारियों को सदुद्धि दे और इन बाबाओं की इंडस्ट्री के आगे ईमानदारी से खड़े रहने की ताकत दे।


सोमवार, 2 सितंबर 2013

नेताओं को पुलिस सुरक्षा जर्रुरत या सत्ता की हनक

देखिए ये लोकतंत्र की कैसी विडंबना है कि इसमें जनता के द्वारा चुने गए लोग, प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक दलों के बड़े पदाधिकारी जो कि खुद को जनसेवक कहलाते हैं। ऐसे लोगों में खुद को खास प्रदर्शित करने की सबसे ज्यादा भूख रहती है। इसका खामियाजा जनता को उठना पड़ता है और उसे अपराधियों और अपराध से दो-चार होना पड़ता है।
आजादी के बाद का इतिहास खंगाले तो ये चीज गौर करने लायक है कि उस दौर के जो जनप्रतिनिधि हुआ करते थे, जिन्होंने की अपनी जान की परवाह किए बिना हमें आजादी दिलाई थी, उनकी जान को हमेशा खतरा रहता था। सादा जीवन और उच्च विचार के सूत्र पर चलने वाले हमारे वो महान नायक आडंबर से कोसों दूर रहते थे। अगर उन्होंने भी ऐसा किया होता तो शायद हमें आजाद होने में काफी समय लगता और वो देशभक्त भी नहीं कहला पाते।
भारतीय संविधान के मुताबिक आम जन को सुरक्षा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है। इसी व्यवस्था के तहत प्रत्येक राज्य में पुलिस बल का गठन किया गया। वैसे तो हमें ये जानकारी है कि रौब गांठने और सत्ता की हनक दिखाने के लिए ही आज के नेता और मंत्रियों के संग कई पुलिसकर्मी उनकी सेवा में तैनात रहते हैं। ऐसे में आमजन की सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मियों की संख्या कम हो जाती है। वैसे ही हमारे राज्य की पुलिस स्टॉफ की कमी से जूझ रही है और नेताओं की चाकरी और वीआईपी ड्यूटी के कारण वह अपना मुख्य काम जो कि जनता की सेवा करना है वह नहीं कर पाती है। वैसे आंकड़ों पर गौर करें तो हमारे देश में जो पुलिस और पब्लिक का रेश्यो है वो कई देशों के अनुपात में कम है। वहीं पुलिस को उसके मुख्य काम से हटाकर दूसरे कामों में लगा देने से चोरी, अपहरण और अन्य घटनाओं में इजाफा होता है। फिर इन घटनाओं का खुलासा नहीं होता है तो भी इसके लिए हम पुलिस को ही जिम्मेदार ठहराते हैं, जबकि वह तो हुक्मरानों के आदेशों को पूरा करने में ही पूरी हो जाती है।

खाद्य सुरक्षा बिल :सरकार की मजबूरी या दरियादिली


देश की ये कितनी बड़ी विडंबना है कि आजादी के 65 साल गुजरने के बाद भी आज भारत वर्ष जो कि कभी कृषि प्रधान देश कहलाता था और जहां अनाज के प्रचुर भंडार थे। जहां तक मुझे याद है या मेरी समझ मेरा साथ दे रही है तो भारत के कृषि प्रधान देश रहने के दौरान शायद ही ऐसा किस्सा सुनने को मिला हो कि देश का कोई नागरिक कभी भूखा सोया हो। उसे किसी ना किसी तरीके से खाने के लिए दो जून की रोटी या कंद-मूल, फल की व्यवस्था हो जाती थी। ये व्यवस्था चाहे उसके स्वयं के द्वारा की गई हो या समाज के प्रधान व धनाढ्य लोगों अथवा प्रकृति के द्वारा। आज राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, विकास के नाम पर राजनीतिक भ्रष्टाचार से शासक द्वारा जनता को दो जून की रोटी मुहैया कराने का काम कहीं पीछे छूट सा गया है और आज खाद्य सुरक्षा राजनीतिक दलों के लिए एक मुद्दा बन गया है। आज हालात ये है कि भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी के दौर से गुजर रहा है। हमारे देश में जिस तरीके से आर्थिक नीतियां लागू हो रही हैं और  राजनीतिक लाभ लेने के लिए जिस तरीके से अमीर और गरीब के बीच खाई खींची जा रही है। विकास के नाम पर खेतों को खत्म किया जा रहा है और जिस प्रकार से देश में भ्रष्टाचार दिनों-दिन सुरसा की तरह से बढ़ रहा है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की ओर से जो खाद्य सुरक्षा बिल लाया गया है। उसने हमें सोचने को विवश कर दिया है कि पिछले करीब चार सालों से सोई हुई सरकार ने आनन-फानन में ये विधेयक लाकर केवल अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध किया है। यहां सोचने वाली बात ये है कि क्या ऐसा करना सरकार की सुशासन की नीति है या कुछ और। सरकार प्रत्येक व्यक्ति को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने का मन बना रही है और इसके लिए लोकसभा में जो बिल लाई है उसके लिए वो निश्चित रूप से बधाई की पात्र है, लेकिन कुछ ऐसे प्रश्न मन में कौंध रहे हैं, जिन पर कि चिंतन करना चाहिए।
एक तरफ कश्मीर और दक्षिण भारत में सस्ते टीवी और चावल बांटे जा रहे हैं तो बिहार व उत्तर प्रदेश जहां पर सबसे ज्यादा भुखमरी की स्थिति है और उनका (केंद्र) राजनीतिक हस्तक्षेप भी कम है। आंकड़ों की बाजीगरी से सरकार ये दिखाकर कि वो हर गरीब को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराएगी अपनी पीठ सरकार खुद थपथपा रही है। यहां दूसरा सवाल ये भी उठता है कि अगर हम भारतीय मानसिकता के अनुसार सोचें तो सरकार का ये महत्वाकांक्षी कदम जिस पर करीब सालाना सवा लाख रुपये का खर्च आना है वो वास्तव में आंकड़ों का हेरफेर है या कुछ और। क्या ये खाना उसके असली हकदार तक पहुंचेगा या सरकारी तंत्र अथवा लालाओं की तिजोरी भरेगा।
वहीं भारतीय जनता पार्टी जो कि प्रमुख विपक्षी दल है। एक ओर जहां वो सरकार की आर्थिक नीतियों को कोस रही है तो वहीं वह दूसरी ओर वोटों की राजनीति के तहत खाद्य सुरक्षा बिल, जिससे कि सरकार पर सब्सिडी  का बोझ बढ़ेगा, उसी का समर्थन कर रही है। और तो और उत्तर प्रदेश व बिहार को ही खाद्य सुरक्षा बिल से सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा, लेकिन इन सूबों के मुखिया अल्पसंख्यकों के प्यार या यों कहें कि वोटों की राजनीति के चलते बिल की आलोचना से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। वैसे जिम्मेदार भारतीय और सरकार के साथ विपक्ष की भी ये जिम्मेदारी है कि चाहे किसी भी परिस्थिति या आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हो. साथ यदि हम ईमानदारी से पात्र व्यक्ति को उसका हक नहीं पहुंचाएंगे या दिलाएंगे तो ऐसा करके हम वंचित वर्ग को भुखमरी की खाई में झोंक देंगे और भारत को ज्यादा बड़े गड्ढे में गिरने से नहीं बचा पाएंगे।

रविवार, 1 सितंबर 2013

आज कितने सार्थक हैं खेल दिवस के कार्यक्रम

 देश की माटी में हमेशा से एक उर्वरा किस्म की तासीर रही है, जिसने कि हमें ध्यानचंद, दारासिंह और वीनू माकंड जैसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी दिए हैं। ये माटी की ही तासीर का कमाल है कि यहां के पहलवानों ने मिट्टी को ही बदन पर लपेटकर कुश्ती के तमाम दांवपेच सीखे हैं। अपनी प्रतिभा से उन्होंने दुनियाभर में अपना और देश का नाम रोशन किया। अगर देखा जाए तो खेल के प्रति लगन व हमारे खिलाड़ियों की शक्ति लगान फिल्म के जरिए अच्छे से समझी जा सकती है। आज विकास की राह में खेल के मैदान में खत्म होते जा रहे हैं। अभी 29 अगस्त को खेल दिवस होने के बावजूद खिलाड़ियों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दिया। आज तमाम आधुनिक सेवाओं से लैस होकर महानगरों में खेल के मैदान (स्टेडियम) तो बन गए हैं और उनमें एक बहुत बड़ी सरकारी फौज भी तैनात है, लेकिन उनकी भावना ना तो खेल और खिलाड़ियों के साथ है। खेल दिवस के दिन भी जो कार्यक्रम होने थे और जिन्हें इस महत्वपूर्ण दिन मनाया जाना था, वो मात्र औपचारिक रस्म या खानापूर्ति तक ही सिमटकर रह गए। आज खेल जगत में खेल भावना का स्थान राजनीतिक भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद की भेंट चढ़ गया है। ऐसे समय में विश्वस्तरीय प्रतियोगिता में हमेशा बेइज्जती का सामना करना पड़ता है, जाकि भारत में जितनी जमीन और जनसंख्या है और जो मानव श्रम उपलध है। अगर इन सभी को सही तरीके से निखारा जाए तो हमारे यहां करीब दो दर्जन से अधिक खेल ऐसे हैं, जिसमें कि हमारे खिलाड़ी हीरे जड़ित पुरस्कार भी ला सकते हैं।
अगर आज जरा गौर फरमाएं तो हमारे यहां गांव का हर व्यक्ति जो कि ढेला फेंकता है। उसकी बराबर क्षमता से किसी भी देश का व्यक्ति ऐसा कतई नहीं कर सकता।
दूसरा उदाहरण हमारे वे खिलाड़ी हैं जो गांवों केागीचों में पत्थर फेंककर आम तोड़ते हैं। ऐसे व्यक्ति एक ही बार में एक निशाने से 10-10 आम तोड़ पाने में सक्षम हैं। ये तो छोड़िए अगर आप कभी उनकी साइकिल पर बैठ जाएं तो उनकी साइकिल हवा से बातें करती हुई दिखाई देती है। यहां प्रश्न ये उठता है कि इतनी क्षमताओं के बाद भी हम क्यों फिसड्डी हैं। बड़ा सीधा सा प्रश्न है। दूसरे देशों में खेलों को प्रोफेशन माना गया है और जीवनपर्यंत सरकार उस खिलाड़ी के परिवार को अपनी जिम्मेदारी मानकर उसके जीवन यापन की व्यवस्था करती है। हमारे यहां दिखावे के रूप में खिलाड़ी को प्रोत्साहन की बात तो की जाती है और सम्मान के रूप में उसे सर्टिफिकेट व तमगा देकर इतिश्री समझ लेते हैं। आज हमारे देश के कम से कम तीन दर्जन ऐसे खिलाड़ी सामने आए हैं, जो कि सड़क पर अपने मेडलों की नुमाइश पर या उन्हें बेचकर अपने परिवार की दो जून की रोटी की व्यवस्था में जुटे हैं। वो अपने इष्टमित्रों व परिजनों से कहते हैं कि जीवन में सब कुछ करना, लेकिन खिलाड़ी मत बनना। भले ही भिखारी बन जाना। हम खेल दिवस के मौके पर ही उन खिलाड़ियों को ना तो याद करते हैं और ना ही उनके जीवन और खेल की प्रतिभाओं को आने वाले खिलाड़ियों को किस्से सुनाकर उनमें उत्साह का संचार करते हैं । शहर के ही चार खिलाड़ी या संस्थाएं, (जिन्हें कि समाजसेवी कहलाने का कोई भी मौका चाहिए) ऐसे लोग और संस्थाएं चंद खेल अधिकारियों के संग फोटो खिंचाकर बिना किसी प्लानिंग व विचारधारा के अगले दिन के अखबार की सुखियां बनते हैं। ऐसे में जो सच्चा खिलाड़ी या उभरती हुई प्रतिभाएं होती हैं। अखबार में अपने से कमतर खिलाड़ियों की छपी हुई फोटो देखकर उनका मनोबल गिर जाता है और उनकी आत्मा भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार को कोसती है। किसी भी विशेष दिवस की सार्थकता तभी होती है कि जब उस दिन को वैभवपूर्ण तरीके से और उस क्षेत्र के सम्मानीय लोगों के साथ गरिमापूर्ण तरीके के साथ मनाया जाए। कई खिलाड़ी तो दबी जुबान में कहते भी हैं कि कुछ मठाधीशों, खेल संगठनों के प्रमुख अधिकारी तो हमारा खून चूस रहे हैं। ये जब तक अपने पदों से नहीं हटेंगे और सरकार के साथ व्यापार जगत के लोग हमें सहयोग नहीं करेंगे तब तक भारत को खेल जगत में अपना सम्मानजनक स्थान बना पाना मुश्किल रहेगा साथ ही इस दिवस को मनाना हाकी के पुरोधा स्व. दादा ध्यानचंद की आत्मा को कष्ट पहुंचाना होगा। खेल केवल खेल जगत में अपना नाम रोशन करने की वस्तु नहीं है। यहां पं. जवाहर लाल नेहरु ने लाल किले से अपने पहले भाषण में जो बात कही थी वो सच साबित होती नजर आती है। उन्होंने कहा था कि भारत में जितने मैंदान हैं, उनमें अगर हम उतर जाएं तो हमें अस्पताल जाने की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी। हमें अस्पताल नहीं खेल मैदान चाहिए। जिस देश के प्रधानमंत्री की ऐसी भावना थी, सोचिए जिस तरीके से खेल दिवस को महज रस्म अदायगी की तरह मनाया गया है, उससे उनकी आत्मा कितनी कचोट रही होगी।
लेखक का सभी खेल प्रेमियों से आग्रह है कि वो खेल को खेल भावना की तरह खेलें और अपने दम पर साथियों के साथ मिलकर ऐसी खेल भावना व संगठन तैयार करें कि देश की 125 करोड़ की जनता को अस्पताल की आवश्यकता ही ना पड़े। विश्व में होने वाली स्पर्धाओं में सर्वाधिक पदक प्राप्त कर देश का नाम रोशन करें।

शनिवार, 24 अगस्त 2013

वोटों की ये कैसी राजनीति

भारतीय संविधान में सभी को अपनी बात कहने का हक है और मनुष्य अपने विचार व्यक्त करने के लिए तरह-तरह के उपाय करता है। कभी कविता, चित्रों, लेखन, पोस्टर तो कभी सड़क पर रैली या पदयात्रा के रूप में। अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करते समय अपनी मर्यादा व शालीनता का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन कई दफा आदमी अमर्यादित हो जाता है और न्यायपालिका के रूप में न्यायालय की शरण लेता है। आजकल मनमोहन सरकार के लिए काफी सारी अभिव्यक्तियां व्यक्त की जा रही हैं। इसी शृंखला में विश्व हिंदू परिषद ने अपने धर्म और भगवान के स्थान पर मंदिर निर्माण को लेकर 25 अगस्त से अयोध्या में 84 कोस की परिक्रमा का ऐलान किया है। इसके विरोध में प्रदेश सरकार खड़ी हो गई है। प्रदेश सरकार ने विहिप के इस आयोजन को विफल करने के लिए सारे जतन करने शुरू कर दिए। समझ में नहीं आ रहा कि ये संविधान का उल्लंघन है या वोटों की राजनीति। उत्तर प्रदेश सरकार जो कि समाजवादी पार्टी की सरकार है। होना तो ये चाहिए था कि उसे समाजवाद का उदाहरण पेश करते हुए इस पदयात्रा के लिए सहमति दे देनी चाहिए थी, लेकिन आज देश की सब व्यवस्थाएं ताक पर रख दी गई हैं।  मात्र राजनीतिक लाभ और वोटों की चाहत के लिए हर पार्टी अपने-अपने तरीके से अपने वोटरों को आकर्षित या कहें कि प्रलोभित कर रही है, चाहे वो कोई भी पार्टी हो। इस रोग से कोई भी दल अछूता नहीं है।
यहां बड़ा ही सोचने का प्रश्न है कि जहां दुनिया भर में भारत की छवि एक हिंदू राष्ट्र की है, उसी देश में ये तमाम राजनीतिक दल अपनी महत्वाकांक्षा के लिए आज हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। भारत की अखंड़ता का जिस तरीके से आज चीर हरण हो रहा है। अंग्रेजों के जमाने की प्रथा फूट डालो और राज करो का ही अनुपालन हो रहा है। सोचिए ऐसे में एक आम भारतीय की क्या दयनीय स्थिति है। इसकी परिकल्पना आप रोज करते होंगे।
मैं यहां एक ही बात कहना चाहता हूं कि हमें राष्ट्र व समाज की उन्नति के लिए तथा प्रत्येक आदमी की भावना व धर्म की सुरक्षा के लिए बिना राजनीतिक स्वार्थ के सभी को अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त कर देनी चाहिए। साथ ही अपनी आस्था भारतीय संविधान व धर्म में रखनी चाहिए। कहने का तात्पर्य ये है कि विहिप के कार्यकर्ताओं व संतों को उक्त परिक्रमा करनी चाहिए। देर रात तक भी ऐसी खबरें छन-छनकर आ रही हैं कि जगह-जगह संतों को गिरफ्तार कर उन्हें परिक्रमा करने से रोका जा रहा है। वहीं एक बात ये भी सोचने की है कि कहीं विहिप का ये कदम राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम तो नहीं है।


देश में फल-फूल रही ‘बाबा’ इंडस्ट्री

देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था में अगर आज हर व्यापार की ग्रोथ में दिन-प्रतिदिन कमी नहीं आई है तो उसमें इजाफा भी नहीं हुआ है। आज आए दिन कारोबार को नई-नई समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। हम भी अपने व्यापार की परेशानियों में उलझे थे कि राखी के दिन व्यापार थोड़ा ठंडा होने से हमने बाजार में व्यापारियों की एक चौपाल लगा दी। पूरी चौपाल के दौरान व्यापार की तरक्की के कई सुझाव आए। यकायक आए एक सुझाव पर तो सभी ने एकमत से सहमति में सिर हिलाया। साथ ही इस दौरान हास-परिहास का भी परिदृश्य उभर गया। ऐसा बहुत कम होता है कि स्वार्थी व्यापारी वर्ग किसी एक बात पर सहमत हो ही जाए।
मान्यवर सुझाव ये था कि अब तो देश में नेता और बाबा इंडस्ट्री तेजी से फल-फूल रही हैं। बस चौपाल में बाबाओं और धर्माचार्यों को लेकर प्रसंग शुरू हो गया। सभी लोगों ने कहा कि इस व्यापार में सुरसा की तरह ग्रोथ हो रही है। आजकल टीवी चैनलों और अखबारों में एक बाबा द्वारा एक बच्ची से किए गए दुष्कर्म की खबर सुर्खियों में बनी हुई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जब किसी बाबा या धर्माचार्य पर इस तरह के आरोप लगे हैं। एक बहुत बड़े संत हुआ करते थे कर्नाटक में। वे अपनी एक अनुयायी के साथ काफी अंतरंग अवस्था में पाए गए थे। काफी हो-हल्ला मचा था कुछ समय के बाद मामला शांत हो गया। ऐसे ही एक कथित बाबा थे दिल्ली में ही, जब पड़ताल हुई तो सच की परतें प्याज के छिलकों की तरह उतरती चली गईं। ये कथित बाबा लड़कियों के सप्लायर थे और काम में किसी तरह की कोई आंच ना आए, इसलिए उन्होंने बाबा का चोला पहन लिया था। इस तरह के कई अन्य मामले आपको इतिहास में देखने को और पढ़ने को मिल जाएंगे।
हां तो उक्त बाबा पर नाबालिग से सेक्स का आरोप लगा है, तभी से नेता इंडस्ट्री पीछे छूट गई है और फिर से बाबा इंडस्ट्री पर चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। आइए सुनाते हैं कि धर्मगुरुओं और बाबा इंडस्ट्री के लाभ ही लाभ। इसी दौरान चर्चा में किसी ने कहा कि, मार्केट में 100 लोग हैं। इनमें से एक धर्माचार्या बन जाता है और 5 उसके अनुयायी बन जाते हैं। साथ ही एक-दो चेलियां, जो कि बेरोजगारी के दौर में ‘पेड’ भी मिल जाएंगी। लो शुरू हो गया अपना काम। इसी बीच फिर एक आदमी बोला, भइया अच्छे कपड़े, इत्र, सुगंधित फूल माला वो भी ऐसी जो कि हमें अपनी शादी में वरमाला में भी नहीं नसीब हुई थी। पांच-दस किलो फूल, ‘पेड’ मीडिया का सहारा और चालू अपना धंधा। दिन-दूनी रात चौगुनी की तरह बढ़ते अनुयायी और बढ़ता प्रॉफिट। तभी एक व्यापारी भाई ने कहा, भइया आप सीधे आदमी हैं। कहीं ऐसा ना हो कि नैया बीच में ही डूब जाए। मैंने बड़े-बड़े धर्माचार्यों, बाबाओं और गुरुओं की जीवनी पढ़ी है, जो जितना बड़ा दुष्ट व्यक्ति था या अनैतिक कामों में माहिर रहा उस बाबा का उतना ही बड़ा साम्राज्य है। अगर आप नहीं मानते हो तो मैं आपको दिखा देता हूं कि ऐसे कई स्वामी हैं, जिन्होंने कि जमीनों पर कब्ज़ा नहीं किया। हमने तो घर के पास में एक फुट जमीन ही कब्जाई थी। इस पर ही हमें ये डर सताने लगा कि हमारे कर्मों का भोग हमारे बेटे-पोते भोगेंगे। वहीं इन तमाम बाबाओं का कुछ नहीं बिगड़ता, जिन्होंने कि लाखों गज जमीन हड़प ली है। माफियाओं से भी ज्यादा असलहे इनके पास आपको मिल जाएंगे और सबसे बड़ा असलहा तो इनके अनुयायियों की फौज है, जिनके बीच में इनका एक चेला होता है। इस चेले की पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में होता है। वह भोग, विलास सहित तमाम सुविधाओं का लाभ उठाता है। उसे भी मालूम है कि बाबा चिरायु तो है नहीं। वह बाबा का चेला बनने की अपेक्षा कहीं और जगह काम करता तो वह केवल दो जून की रोटी ही कमा पाता। यहां बाबाजी की जय-जयकार और उनके डंडे-झंडे लेकर चलने में ही रोज उसके हजार-पांच सौ लोग पैर छूते हैं। साथ ही रोजाना छप्पन भोग खाने को मिलता है सो अलग। साथ ही बढ़िया क्वालिटी के कपड़े, एसी में रहना और आरामदायक गद्दों में सोने का सुख। वहीं शारीरिक भूख भी रोज नए तरीके से मिटती है। अंत में अगर बाबाजी के साम्राज्य में से थोड़ा सा भी हिस्सा मिला तो वह चेला अरबपति तो वैसे ही बन जाएगा।
इस चर्चा में एक आदमी फिर बोला, राजीव भाई हम तो रोज की दिनचर्या में इतने व्यस्त और टेंशन में रहते हैं कि पत्नी के बनाए खाने में नमक कम-ज्यादा होने का ही पता नहीं चल पाता। हमें भी ऐसी ही सुविधाएं मिलें तो भइया हम भी उन लोगों की तरह इंटरनेट पर देख-देखकर, किताबें पढ़-पढ़कर इनसे भी अच्छा  प्रवचन दे सकते हैं। आज तो इस पेशे में देखिए। फिर कोई बोला, भाई इस पेशे में पहले वाली बात नहीं रह गई कि केवल बंडी वाले ही आचार्य बनें। अब तो आईएएस, प्रोफेसर और बेरोजगार युवा भी इंग्लिश में गीता और दूसरे धर्मग्रंथ पढ़ते हैं। आप अगर नहीं मानते हैं तो वृंदावन चले जाइए या टीवी पर चलने वाले किसी भी धार्मिक चैनल को चलाइए। ऐसे कई धार्मिक चैनल हैं, जो कि इन बाबाओं के ही रहमों करम पर चल रहे हैं।
हमारी दादी कहती थी कि साधु और आचार्य वो होते हैं कि जिन्हें स्वाद से कोई मतलब ना हो। बस तन ढंकने को लंगोटी। आपने भी कोई ना कोई धर्मग्रंथ पढ़ा होगा। हर धर्म के ग्रंथ का सार यही है कि त्याग में ही जीवन है। आज जिस तरीके से भोग-विलासिता, सेक्स रैकेट, जमीन पर अतिक्रमण, राजनीतिक हस्तक्षेप, कॉर्पोरेट की तरह कामकाज चलाना और कोई भी अनैतिक कार्य करके अपनी चेलियों को भी आगे करके सभ्य पुरुष का मुंह बंद कर देने को साम, दाम, दंड, भेद  का इस्तेमाल करना। मैं यहां किसी भी बाबा, स्वामी या व्यक्ति विशेष अथवा किसी धर्म पर अंगुली नहीं उठा रहा। आप इस लेख को पढ़कर अपने ज्ञान चक्षु खोलिए और आसपास दृष्टि दौड़ाएंगे तो लगेगा कि बाबा, स्वामी, आचार्यों की इंडस्ट्री हर रूप में धन, जमीन, जायदाद, ऐश, अय्याशी, हुकूमत सभी दृष्टिकोण में कितनी तेजी से फल-फूल रही है और आम आदमी जो अपने जीवन की लड़ाई में इतना त्रस्त है कि वो इनके चमचमाते आश्रम, कड़ी सुरक्षा, मीडिया, भक्तों का रेला देखकर भ्रमित हो जाता है। इन बाबाओं के आश्रम में आने वाले 100 में से 25 लोगों के काम बनते तो ईश्वर की कृपा से हैं, लेकिन वो इसका श्रेय संबंधित बाबा को ही देते हैं।
साधु का मतलब होता है अपने कार्य, आचरण और क्रिया कलाप आदि से संयमित जीवन जीने वाला। मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा। अगर आप किसी बाबा के अनुयायी के सामने अगर बाबा के बारे में विरोधी बात कह देंगे तो उसका संयम धरती फाड़कर किसी काले नाग की तरह आपको डंसने के लिए तैयार हो जाएगा। इसका हालिया उदाहरण इंडिया न्यूज पर देखने को मिला कि जब एक घंटे के पैनल डिस्कशन में बाबा के मीडिया प्रवक्ता ने करीब 45 मिनट तक किसी दूसरे को बोलने का ही मौका नहीं दिया। एंकर दीपक चौरसिया खुद को लाचार सा महसूस करने लगे। ऐसे आदमियों की मानसिक स्थिति से आप दो-चार हो गए होंगे कि उन्होंने बात का बतंगड़ कैसे बनाया। ये बात ठीक है कि भारत का संविधान हर किसी को अपनी बात कहने और बोलने का अधिकार देता है, लेकिन हम तो कुछ बोल ही नहीं पाए और उस प्रवक्ता ने अपना टीचरपना झाड़ दिया और डिस्कशन में आए दूसरे लोग मूक दर्शक बने रहे। ये कोई नई बात नहीं है। ऐसे तमाम किस्से आपको अक्सर देखने को मिल जाएंगे। इसमें तीन चीजें प्रमुख हैं। सेक्स, जमीन पर कजा और दूसरे के विवाद सुलझाने के लिए पंचानना। साथ ही अपने उत्पादों की एक इंडस्ट्री लगाना। स्थिति ये है कि आज आम आदमी की आस्था और विश्वास साधुओं पर से उठता जा रहा है, क्योंकि जब साधुओं द्वारा किसी की बहन-बेटियों से दुष्कर्म जैसी घटनाएं सामने आती हैं तो आम आदमी बेबस होकर ये सब देखता रहता है। उसे एक घृणित समाज की अनुभूति होती है।
मेरा पाठकों को बताने का तात्पर्य ये है कि लगभग हर बड़े शहर में बाबाओं के आश्रम चल रहे हैं। उनके प्रति आस्था होना बुरी बात नहीं है, लेकिन इसमें इतने अंधे भी ना हो जाएं कि अपनी बहन-बेटी को पांचाली बना दें या किसी बाबा को अपनी जमीन-जायदाद सौंप दें।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

जब हम बने देश के वित्त मंत्री



कुछ सालों पहले आई अभिनेता अनिल कपूर की फिल्म नायक में उन्हें एक दिन का मुख्यमंत्री बनते हुए दिखाया था। उस फिल्म में बताया था कि कैसे एक दिन का सीएम बनकर अनिल कपूर ने समाज में व्याप्त सभी बुराइयों को दूर करने के लिए दिन-रात एक कर दिया था। उस फिल्म की याद आज जेहन में ताजा हुई तो हमारा भी मन घोटालों को रोकने, बढ़ते अपराध व यौन शोषण की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए मचल उठा.  देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार को देखते हुए मन कहने लगा कि आज सच्चा लाल बहादुर शास्त्री बना जाये तो बढ़ती खाद्य समस्या को देखते हुए अन्न देवता बनने के सपने बुनने लगे.
आज देश की आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मन और दिमाग ने वित्त मंत्री बनने का प्रण लिया और लग गए प्लानिंग करने के लिए। साथ ही शुरू कर दिए दिमागी घोड़े दौड़ाने। जैसे-जैसे घोड़े दौड़ते गए दिमाग वैसे-वैसे ही खुलता गया। इसी दौरान मन में ये विचार आया कि जो तुम सोच रहे हो क्या ये सही है। दिमाग ने कहा कि जब बडे़-बड़े अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री ही फेल हो गए तो तुम भी अगर फेल हो जाओगे तो क्या बड़ी बात है। जब तक सोचोगे नहीं, तब तक कैसे जीत-हार का फैसला कर सकोगे। हमने गीता का श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते, ग्लानि....
को ध्यान किया और अपनी योजनाओं को इस ब्लॉग के माध्यम से लिखना शुरू कर दिया। सारे राजनीतिक लोगों और देश के तमाम धनाढ्य लोगों का कालाधन  जो कि स्विस बैंक में जा रहा है। उसके लिए नॉमिनल टैक्स पर बांड जारी कर दें। इससे अपना पैसा अपने देश में रह जाएगा। किसी जमाने में भारत को ऐसे ही सोने की चिड़िया नहीं कहा जाता था। आज भी खनिज पदार्थों और कई अन्य बहुमूल्य पदार्थों व धातुओं की खानें हमारे देश में हैं। सबसे बड़ी खान तो देश की बढ़ती हुई जनसंख्या है। अगर हम अपने उत्पादों का निर्यात बढ़ा दें तो विदेशी मुद्रा भारत में आनी शुरू हो जाएगी। दिमाग ने तुरंत गांधीजी को प्रणाम किया कि गांधीजी की क्या दूरदृष्टि थी कि वो स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर फोकस करते थे और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर जोर। यकायक मन में पर्यावरण प्रेम जाग उठा और कहा कि अरे वाह हम तो पर्यावरण प्रेमी बन गए। साथ ही सरकारी काफिले में चलने वाली तमाम गाड़ियां ban कर दें। साथ ही देश में तीन आदमियों पर एक गाड़ी का कानून लागू कर दें।  इको व सोलर सिस्टम से चलने वाली गाड़ियों को प्रोत्साहन दिया जाए। इसके अलावा सभी बड़े शहरों को जाम से मुक्ति दिला दी जाए। इन उपायों से ये हो सकता है कि हम पेट्रोल के आयात के बजाए उसका निर्यात करने लगें और ऐसा होने पर देश में विदेशी मुद्रा के आगमन के साथ ही इसकी तरक्की में हर भारतीय का योगदान बढ़ेगा।
अरे तुम कहां सो गए यार। मृग की कस्तूरी की तरह हम यहां-वहां भटक रहे हैं। । भारत रमणीय स्थलों व पर्यटन स्थलों के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य की खान है। अगर हम पर्यटन को बढ़ावा दें, विदेशी सैलानियों को आकर्षित करें (जैसा कि दूसरे देश जहां अप्राकृतिक तरीके से पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं उनके मुकाबले मार्केटिंग करें)  तो मुझे लगता है कि जिस तेजी से आज रुपया गिर रहा है, उसी तेजी से रुपया मजबूत होगा। इन तमाम उपायों से ना केवल विदेशी मुद्रा के भंडार में इजाफा होगा, अपितु हमारे देश के नागरिकों को रोजगार भी मिलेगा। ये लो भइया हम उद्योग मंत्री भी हो गए और हमने कहा कि हमारे भारतीय लघु उद्योग जो कि अभी मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। आनन-फानन में उन उद्योगों से जुड़े लोगों से भी कह दिया कि आप अपना उत्पादन बढ़ाइये और जितना हो सके निर्यात करिए। निर्यात करने पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगेगा और देश के लिए जितना हो सके उतनी विदेशी मुद्रा अर्जित करो।
दिमाग में काफी सारे विचार हैं, लेकिन कहावत है ना कि ज्यादा के फेर में थोड़े से भी आदमी चूक जाता है। इन तमाम विचारों का सार यही है कि हमने देश के गिरते हुए रुपये को थामने का प्रयास किया है और भारतीय मानसिकता की तरह खुद की पीठ खुद ही थपथपा ली और निर्णय किया कि अगले दो सालों तक विदेश यात्रा की योजना रद्द कर दी जाए। इस दरमियान देश के विभिन्न रमणीय पर्यटन व तीर्थ स्थलों की सैर बच्चों को कराई जाए।

सुनहरे भविष्य पर भारी रैगिंग का भूत


बड़ी उमंग और जोश के साथ आज का युवा अपने मनपसंद कोर्स और पढ़ाई के लिए गांव से शहर और शहर से महानगर जाता है। वहां वह भविष्य सुनहरा बनाने के लिए कॉलेज में प्रवेश लेता है। मां-बाप भी अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुनते हुए कर्ज लेकर भी बच्चे को पढ़ने के लिए भेजते हैं। बाहर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान आवासीय सुविधा के लिए बच्चा हॉस्टल में रहता है। बड़े ही अफसोस की बात है कि वहां उसका सामना रैगिंग से होता है।
गांव से शहर गया युवा जब रैगिंग की प्रताड़ना से गुजरता है तो उसके मन में एक डर की भावना बैठ जाती है। किसी समय में कॉलेज में रैंगिग का अर्थ होता था आपस में मेल-मुलाकात, एक-दूसरे से जान-पहचान बढ़ाना और एक-दूसरे की छिपी प्रतिभा को उभारने व जानने का अवसर देना। एक जमाने में हर शहर के स्कूल-कॉलेजों में ऐसा होता था। रैगिंग की ये परंपरा सभी विश्वविद्यालयों, स्कूलों और कॉलेजों का अभिन्न अंग रही है। इसके माध्यम से हम अपनी जान-पहचान व भाईचारा बढ़ाते थे। धीरे-धीरे खुद को सुपरमैन दिखाने की होड़ में इस परंपरा का स्वरूप ही बिगड़ता चला गया। आज नए स्वरूप में भौंडेपन की और अश्लीलता की पराकाष्ठा पार कर गई है। किसी समय सीनियर्स को बड़े भाई- बहन के रूप में सम्मान दिया जाता था, लेकिन अब स्कूल-कॉलेज में जूनियर्स उनसे ऐसे बचते हैं कि जैसे कोई टिड्डियों का दल आ गया हो और मैं क्या कहूं अब तो ऐसी भयंकर घटनाएं आए दिन अखबारों के आगे के पन्नों की सुर्खियां बनती हैं। वहीं न्यूज चैनल के प्राइम टाइम में भी देश का प्रबुद्ध वर्ग इस पर लंबी चौड़ी बहस करके खुद को ज्ञानी साबित करने का दिखावा करता है।
कर्ज लेकर मां-बाप द्वारा पढ़ाई के लिएा बाहर भेजा गया बच्चा जब रैगिंग का शिकार होने के बाद आत्महत्या के लिए मजबूर होता है और जान दे देता है तो पीड़ित परिवार की मनोस्थिति की कल्पना करने में ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस परिवार के मित्र व सगे-संबंधी भी अपने बच्चों के प्रति आशंकित होने के साथ ही दुविधा में पड़ जाते हैं। ऐसे कई किस्से आपको देखने को मिल जाएंगे। परिवार के किसी परिचित के यहां भी ऐसी घटना घटी या ऐसे में वह परिवार या उसके (मृतक) दोस्त पढ़ाई से विमुख होकर घर लौट आते हैं। देखा जाए तो यह भी एक तरीके से उनके सुनहरे भविष्य की आत्महत्या ही है।
 आज को-एजुकेशन के दौर में अश्लीलता के किस्से या कहानियां मैं आपको यहां लिख नहीं सकता बस आपको याद दिला सकता हूं अथवा ध्यान आकर्षित कर सकता हूं। रैगिंग के दौरान होने वाली अश्लीलता ब़ोलीवुड की सी ग्रेड मूवी को भी पीछे छोड़ देती है।
रैगिंग का एक और पहलू है, वो ये कि जो नारी कभी लज्जा का स्वरूप मानी जाती थी। उसकी लज्जा जब तार-तार होती है और कॉलेज प्रबंधन से जुड़ी महिलाएं ही कुछ नहीं कर पाती हैं। आज नारी ने हर क्षेत्र में अपनी बराबर की भागीदारी निभाई है तो रैगिंग में वे लड़कों से कैसे पीछे रह सकती हैं। आज लड़कियों को भी रैगिंग के इतने तरीके भाते हैं कि वो उसकी कॉपी करने से भी नहीं चूकती।
यहां प्रश्न ये उठता है कि पूर्व में जो भाईचारे का स्वरूप था आज उसका इतना विकराल रूप कैसे हो गया है। अगर परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो भारत में बढ़ती स्वतंत्रता और स्वछदंता की प्रवृत्ति, मां-बाप का बच्चों के प्रति अत्यधिक लाड-प्यार, छात्रों की मानसिक विकृत्ति और खुद को सुप्रीम दिखाने की चाहत रैगिंग रूपी दलदल के तालाब को प्रतिदिन बढ़ाती जा रही है। ऐसे में कॉलेज प्रबंधन, स्थानीय पुलिस-प्रशासन, राज्य व केंद्र की सरकारों ने इसे रोकने का खाका तो तैयार कर लिया है, लेकिन हर खाके की तरह इसका भी सख्ती से पालन ना होना या ढुलमुल रवैया होना इस पर अंकुश लगाने में असक्षम साबित हो रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट इस तरीके के रवैये को रोकने, केंद्र और राज्य सरकारों को कड़ाई से कानून लागू करने का आदेश दे चुका है।
आज सबसे पहले कॉलेज प्रशासन को ही इस पर सख्ती बरतनी चाहिए, लेकिन सबसे ज्यादा निष्क्रियता वहीं पर दिखती है। गौर फरमाया जाए तो अपनी दिनचर्या में तमाम कॉलेज प्रशासन इतने मशरूफ है कि कॉलेज का अनुशासन सुधारने की ओर उसका कोई ध्यान ही नहीं है। अगर इसे सुधारने का प्रयास भी किया जाता है तो छात्र कॉलेज के खिलाफ प्रदर्शन पर उतर आते हैं। इस दौरान अगर एकाध गांधीजी जैसा व्यक्तित्व आता भी है उन्हें समझाने के लिए तो उसे छात्रों द्वारा इतनी यातना दी जाती है कि वो तुरंत अपने कदम पीछे खींच लेता है। ऐसा इसलिए क्योंकि पुलिस-प्रशासन से उसे कोई सहयोग नहीं मिलता है। आज रैगिंग रोकने के लिए बनाई गई हेल्पलाइन ही हेल्पलैस साबित हो रही है क्योंकि इस तरीके का कोई भी किस्सा सामने आने पर कॉलेज वाले उसे हरसंभव दबाने का प्रयास करते हैं, ताकि कहीं मीडिया में ये मामला उछलने पर उस कॉलेज का नाम बदनाम ना हो जाए। इसलिए कॉलेज छात्रों पर ये दबाव बनाता है कि वो रैगिंग के खिलाफ कुछ नहीं बोलें।
हाल ही में आगरा के एक नामचीन स्कूल में रैगिंग से हटकर एक मामला दिखा, जो कि साफ तौर पर ये बताता है कि दादागीरी प्रतिभा पर कैसे भारी पड़ती है और इस किस्से को दबाने के लिए पीड़ित परिवार पर ही दबाव बनाया गया। एक ओर तो हम मानवता की दुहाई और मानवाधिकारों की बात करते हैं और शिक्षा को मानव का ताज मानते हैं तो दूसरी ओर इस तरह की घिनौनी हरकत से किसी परिवार के सुनहरे भविष्य का ही नहीं, अपितु देश की उभरती हुई प्रतिभाओं का भी गला घोंट रहे हैं।
अत: आज पेरेंट्स को अपने बच्चों के साथ दोस्ती का व्यवहार रखकर उनके साथ होने वाली हर गलत घटना के प्रति आवाज उठानी होगी। वहीं कॉलेज प्रबंधन को भी चौकन्ना होकर रैगिंग को सख्ती से रोकने की व्यवस्था करनी होगी। ऐसा होने पर कॉलेज का नाम खराब होने की जगह चमकेगा और अभिभावकों के मन में कॉलेज के प्रति सकारात्मक प्रभाव भी जमेगा।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

प्याज का प्यार, पेट्रोल की मार


आइये देखते हैं प्याज का प्यार, पेट्रोल की मार क्या गुल खिलाती है और कितने लोगों को रोजगार के साथ कई मुद्दे दे जाती है। एक ओर राजनीतिक दल चाहे सेंसेक्स का घटना-बढ़ना, मार्केट से खाद्य पदार्थों का गायब होना या उनके रेट में इजाफा होना इन जैसे कई मुद्दों को लेकर सत्ताधारी दल को घेरने से लेकर आम जन की आवाज उठाने के लिए वे जनता के हितैषी बन जाते हैं और ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाते हैं कि लगातार मीडिया की सुर्खियां बटोरते रहे। ऐसा करके शायद वे खुद को देश का सबसे बड़ा शुभचिंतक सिद्ध करना चाहते हैं। इसके लिए वे पुतला दहन, रैली, जाम तथा हल्लाबोल जैसे तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं। गधा सवारी सहित अनेक ढोंगी तरीकों से वे जनता के हमदर्द बनकर उनके घरों में घुसने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा जब-जब आम आदमी से जुड़ी चीजें महंगी होती हैं तो वे एक-दो ट्रक खरीदकर जनता में बंटवा देते हैं। हालिया प्याज के बढ़ते दामों के बाद भी ऐसा ही देखने को मिला है।  दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपना प्यार, अरे प्यार नहीं प्याज की 1000 मोबाइल वैन दिल्ली में चलवा दी हैं, जो कि अलग-अलग जगहों पर 50 रुपये किलो की दर से लोगों को प्याज बेचेंगी। दिल्ली सरकार का यह कदम वोटरों को अपने पाले में करने वाले उन कामों जैसे ही कामों में से एक है कि जैसे चुनाव से पहले वाली रात को वोटर को अपने पाले में करने के लिए उसे पैसे और चुनाव का लालच दिया जाता है और तो और हमारे देश का प्रबुद्धजीवी वर्ग और चित्रकार भी अपने-अपने तरीकों से कला का प्रदर्शन करते हैं या लोगों का मनोरंजन। आखिरकार उन्हें काम मिलने के साथ ही कला के प्रदर्शन का मौका जो मिल जाता है।
ऐसे समय में दुनिया भर के लोग कविवर बन जाते हैं और अपनी कविता व कार्टून फेसबुक जैसी सोशल साइट पर अपलोड कर अपनी छिपी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। आजकल फेसबुक पर मैं भी खोज रहा हूं प्याज जड़ी हुई सोने की अंगूठी को। इसमें सोने की रिंग में किसी डायमंड की भांति प्याज को बेहद खूबसूरती के साथ जड़ा गया है। ना तो आज किसी मध्यमवर्गीय के पास सोना खरीदने के लिए धन है और ना ही दो जून की रोटी अपनी इच्छानुसार साग-सब्जी से खाने की हिम्मत। मैं अपनी उम्र के इस पड़ाव में अपने ससुर से ये भी नहीं कह सकता कि ससुरजी दहेज में दी गई कार ले लो और मुझे हर माह एक निश्चित रकम का पेट्रोल भिजवा दिया करो। आज जब बेटा पेट्रोल के लिए पैसे की मांग करता है तो ये बात जेहन में आने के साथ-साथ पर्यावरण प्रेम भी जाग उठता है और मैं उसे ई-बाइक के फायदे गिनाने शुरू कर देता हूं।
बाप सेर तो बेटा सवा सेर 
इस कहावत की तर्ज पर ही बेटा कहता है कि पापा आप भी कैसी दकियानूसी बातें करते हो। ऊंचा देखिये और ऊंचा ही सोचिए। प्रदेश सरकार के एक मंत्री या किसी ताकतवर अफसर के साथ कई गाड़ियों का काफिला चलता है, ता क्या वो फिजूलखर्ची नही होती। संसद और विधानसभा की कैंटीन में 15 रुपये में भरपेट खाने के साथ प्याज भी फ्री में मिलता है।
ऐसे में मनन करना पड़ता है कि क्या सुरसा की तरह बढ़ रही महंगाई कहीं हमारे नेताओं के लिए तो वरदान साबित नहीं हो रही। अपनी बात को आसानी से वोटरों तक पहुंचाने के लिए। वाह रे मीडिया गरीब को खाने को दो जून की रोटी नहीं, प्याज के महंगे होने की खार छापकर गरीब की आत्मा को तड़पाते हो। दो जून के लिए गरीब के पास आटा तो है नहीं टीवी स्क्रीन पर प्याज दिखाकर उसकी गरीबी और लाचारी का मजाक क्यों बनाते हो। आप तो गरीबों के साथ ऐसा ना करो। प्रबुद्ध वर्ग के पास हास-उपहास का समय नहीं है। उन्हें तो पेट्रोल और प्याज के कार्टूनों को देखकर या पढ़कर आनंद लेने दो और हमें बख्शो। साथ ही दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए कमाने को जाने दो।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

पुरस्कारों में भाई-भतीजावाद या रिश्वत का बोलबाला


स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस जैसे आजादी के पर्व के मौकों पर देश के प्रतिभावान लोगों (खेल, साहित्य, फिल्म, कला व अन्य क्षेत्र से जुड़े) को जिन्होंने कि अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है, को सम्मान स्वरूप पदमश्री, पद्म विभूषण जैसी उपाधियां राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के हाथों दी जाती है। अभी तक ये सम्मान बेहद ईमानदारी से सरकार की ओर से दिए जा रहे थे, लेकिन आज जिस तरीके से राजनीति में भ्रष्टाचार, परिवारवाद, भाई-भतीजावाद की परंपरा बढ़ गई है, उससे आज ये पुरस्कार भी अछूते नहीं रह गए हैं। कहा जाता है कि आटे में नमक तो चलता है। ऐसा तो पहले भी होता होगा, लेकिन एक दशक से इस प्रक्रिया पर अंगुली उठना, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद का आरोप आदि किसी एक क्षेत्र की प्रतिभा नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की प्रतिभाओं द्वारा उंगलियां उठाई जाती रही हैं। इसमें दिन-प्रतिदिन अमरबेल की तरह वृद्धि हो रही है। वहीं, इनसे कमतर श्रेणी के पुरस्कारों में अक्सर राजनीतिक हस्तक्षेप, लालच, समाज में चल रहे भाई-भतीजावाद और पैसे का बोलबाला आम रहा है। कई उपाधियां तो पैसे से दी जाती रही हैं, जो कि गुणवत्ता की किसी कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।
हाल में ही सरकार ने पुरस्कार दिए जाने की चयन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। ये बदलाव है कि इसमें जो लोग खुद को पात्र मानते हैं, उन्हें अपनी बायोग्राफी लिखकर देनी होगी, फिर चयन समिति उसे पढ़कर अपना निर्णय देगी।
ऐसे समय में मन में एक सवाल उठता है कि अगर कोई व्यक्ति अपना प्रजेंटेशन, लेखन किसी विशेषज्ञ से लिखवाकर और प्रमाण-पत्र आदि खरीदकर लगा दे तो अयोग्य व्यक्ति भी ऐसा करके खुद को योग्य साबित कर देगा। बड़े ही ताज्जुब की बात है कि इन सबको देश के सर्वोच्च पुरस्कार या उपाधि उस क्षेत्र में उस पात्रता को देने के लिए शुरू हुई प्रक्रिया देखनी चाहिए। जिस व्यक्ति ने उस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान देकर देश का नाम बढ़ाने के साथ ही उस क्षेत्र का कद बढ़ाया है।
बड़ी ही हंसी आती है कि जब हम उभरते हुए फिल्मी कलाकारों को तो हम ये सम्मान देते हैं, जबकि वो खाली एक नाट्य रुपातंरण है। ये ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने कि किसी भी कला के क्षेत्र में अपना उल्लेखनीय योगदान नहीं दिया है। वो तो मात्र कहानी और झूठ का प्रजेंटेशन और अपने राजनीतिक रिलेशन के सहारे पात्र बन जाते हैं।
मेरा तो ये मानना है कि उच्च या श्रेष्ठ सम्मान तभी तक श्रेष्ठ रहता है, जब तक कि वो श्रेष्ठता के हर नियम और कायदे कानून का पालन करता है। अगर इस तरीके के बिना श्रेष्ठता के नियम और कानून को ध्यान में रखकर अगर हम इन सम्मानों में आरोपों व प्रत्यारोपों के दलदल में फंसेगे या उंगली उठाएंगे तो इनकी श्रेष्ठता कम हो जाएगी। मुझे तो डर है कि कहीं इस तरीके से दिन-प्रतिदिन राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक भाई-भतीजेवाद और राजनीतिक आरोप लग रहे हैं। इनसे बचने के लिए फीस तय कर देनी चाहिए।
कहते हैं कि अगर कहीं घूसखोरी का चलन आम है तो इसे लीगल कर देना चाहिए। इसी तरीके से इन सम्मानों के लिए भी सरकार को फीस लगाकर 'जैसा सम्मान, उतनी फीस' वसूलकर खुद को इन आरोपों से अलग रखना चाहिए। जिस तरीके से आज देश में सैकड़ों सम्मान बिना किसी पात्रता के पैसे के बल पर प्राप्त किए जा रहे हैं। इन तरीकों के सम्मान की श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए और प्रतिभाओं के आत्मसम्मान की आत्महत्या से रोकने के लिए सरकार को इस विषय पर गंभीरता से मंथन करना होगा अन्यथा प्रतिभाओं का इस तरीके से अत्याचार उन प्रतिभाओं को देश व राज्य से पलायन करने से कोई नहीं रोक पाएगा और उभरती हुई वे प्रतिभाएं जिन्हें कि सम्मान मिलता है, वे दूसरों के लिए मोटिवेशन और आईकॉन का काम करती हैं। अत: इस पर जनता को भी आवाज उठाकर इस तरीके के सम्मानों की श्रेष्ठता को बचाने का काम करना चाहिए।

अतुलनीय है हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान





कल का दिन भारतीयों के लिए काफी महत्वपूर्ण दिन था। दरअसल, 15 अगस्त के ही दिन हम भारतवासी गुलामी की बेड़ियां तोड़कर आजाद हुए थे। इस आजादी को पाने में हमारे  पूर्वजों का जो योगदान है वो कभी भी ना तो भुलाया जा सकता है और ना ही चुकाया जा सकता है। इस ऐतिहासिक घटना को तो इतिहास के पन्नों में पढ़कर केवल महसूस ही किया जा सकता है। हमारे पूर्वजों के त्याग की अगर कल्पना की जाए तो उस जमाने में उन्होंने सीमित संसाधनों में आजादी की लड़ाई लड़ी थी। आज के परिवेश में जहां विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली है और बहुत सारी सुविधाएं और साधन दिए हैं, उन सबकी तो उस जमाने में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यहां रामायण की एक चौपाई का जिक्र करना जरूरी है कि राम-रावण युद्ध में सत्य की लड़ाई के लिए रामचंद्रजी ने जमीन से ही लड़ाई लड़ी थी। आज आजाद भारत में हम भारतीय स्वतंत्र लोकतंत्र में रह रहे हैं और आज हम सभी भारतीय उस आजादी का उत्सव जगह-जगह पर अपने तरीके से मनाते हैं। हमें ये विचार करना होगा कि हमने अंगे्रजों से तो आजादी पा ली, लेकिन क्या हम आजाद हैं। हमें लगता है कि पंद्रह अगस्त के दिन को हम खाली आजादी का पर्व मनाने की एक रस्म की तरह ही मना रहे हैं, जबकि ना तो हम अभी तक आजादी के मायने समझ पाए हैं और जिस तरीके से हमारे देश में लोकतंत्र का मजाक बनाया जा रहा है। उससे हम लोगों को सोचना होगा कि क्या हम कुएं से निकलकर खाई में तो नहीं गिर गए हैं। इस के कई कारण है, जिनमें आज हमारे देश में जो आतंकवाद का साया, पड़ौसी देशों का खौफ, अर्थव्यवस्था का दिन-प्रतिदिन कमजोर होना और कृषि प्रधान देश होते हुए भी खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों के सामने हाथ फैलाना और अपने देश में दूसरे देशों को व्यापार के लिए आमंत्रण देना, राजनीतिक दलों द्वारा भ्रष्टाचार करके देश को खोखला करना तथा बेरोजगारी के ग्राफ में निरंतर इजाफा आदि हैं।
ऐसे समय में हमें लगता है कि हम अंग्रेजों से तो आजाद हो गए, लेकिन अपने ही लोगों द्वारा पराधीन तो नहीं होते जा रहे हैं। आज जहां भारत विश्व में अपनी  पहचान रखता है। आजादी के बाद लालबहादुर शास्त्री जैसे नेताओं ने विश्व में भारत का सिर गर्व से ऊंचा किया था और हमारा देश विकासशील देशों की श्रेणी में दिन-प्रतिदिन तरक्की कर रहा था। आज भी हमारी फौज दुनिया की दूसरे नंबर की फौज है, तो अर्थव्यवस्था के मामले में हम चौथे नंबर पर हैं। मजबूत लोकतंत्र और मानव संसाधन के मामले में किसी से कमजोर ना होते हुए भी हमारे कई भाई-बहन आज हम हमेशा डर के साए में जीते हैं। अपने ही सिपाहियों को सरहद पर शहीद होते हुए बेबसी के साथ देखते हैं। मुझे एक कहावत याद आती है कि
                               मेरे घर को मेरे ही चिराग ने आग लगा दी।
इसके अर्थस्वरूप आपको समझ आएगा कि हमारे ही नेता कभी धर्म, जाति, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपनी तानाशाही के बहाने अपने देश को दीमक की भांति खोखला करने में लगे हैं। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस को मात्र रस्म अदायगी की तरह मनाना मुझे ऐसा लगता है कि जब तक शैक्षिक बौद्धिक स्तर पर हम इसका चिंतन नहीं करेंगे और लोकतंत्र में रहते हुए इसके लिए आवाज नहीं उठाएंगे तो ये मात्र एक रस्म अदायगी ही रह जाएगी और कहीं फिर हम अपने ही नेताओं या किसी अन्य राष्ट्र की गुलामी के शिकार ना हो जाएं।

पर्यावरण असंतुलन के लिए जिम्मेदार कौन

हाल ही में जून माह में उत्तराखंड में चार धाम की यात्रा के दौरान आई दैवीय आपदा की दुखद घटना की यादें लोगों के जेहन में आज भी ताजा है। ये भारत और इसके पहाड़ी इलाकों में आई आ तक की सबसे बड़ी दुर्घटना साबित हुई है, जिसमें कि हजारों लोग काल के गाल में समा गए हों। ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि पिछले 10 सालों में दिन-प्रतिदिन इस तरह की घटनाओं में काफी इजाफा हुआ है। अगर विश्व पटल पर गौर करें तो ऐसी अनेक प्राकृतिक घटनाएं, जिनसे की अपार जनहानि व संपत्ति का नुकसान हुआ है और संबंधित  देश व शहर को उससे निबटने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी हो।
एक ओर पूरे विश्व में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर सरकारें, स्वयंसेवी संगठन व लोग परेशान हैं। इससे लड़ने व इस समस्या से उबरने के लिए तमाम तरह के उपाय हो रहे हैं, लेकिन ये सभी उपाय ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। हकीकत में देखा जाए तो इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं व ग्लोबल वार्मिंग से निबटने के लिए कोई भी ठोस कदम सही तरीके से हम नहीं उठा रहे हैं।
दूसरी ओर जिस तेजी से हम प्राकृतिक संपदाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं या उनका दोहन या हनन कर रहे हैं उससे ये समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप ले रही है। जिस तरीके से आज जंगलों को काटकर शहर बनाए जा रहे हैं और शहरों का औद्योगिकीकरण हो रहा है और नहर-नदियों से जिस तरीके से बालू और रेती का खनन किया जा रहा है या नहरों के पानी का दोहन हो रहा है। इन सबसे जो प्राकृतिक अंसतुलन बिगड़ रहा है। हमारे शहर, राज्य या देश में जो रमणीय स्थल थे, जहां कि खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में हैं, चाहे वो पेड़, पहाड़  या अन्य किसी रूप में हों। वे सा तेजी से खत्म होते जा रहे हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं के मूल में यही सब कारण हैं। औद्योगिकीकरण और विकास की दौड़ में हम अगर इन प्राकृतिक संपदाओं को नहीं बचाएंगे तो वो दिन दूर नहीं कि जब ये प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं के चलते हम रेगिस्तान में रहने को मजबूर हो जाएं। ऐसे समय में सरकार के साथ साथ प्रत्येक नागरिक का ये कत्र्तव्य है कि वो खुद के लिए ना सही, आने वाली जनरेशन के लिए चारों ओर से इसको बचाने और बढ़ाने का प्रयास करे। इसमें जो आम नागरिक हैं, वे भी अपनी ओर से प्रयास कर सकते हैं। उसमें पेड़ों की कटाई पर सख्ती से रोक लगे और ज्यादा जरूरत होने पर ही पेड़ काटे जाएं, ऐसा प्रावधान हो। साथ ही एक पेड़ के काटे जाने की एवज में दो पेड़ लगाए जाएं। वहीं अपने मकान या रहन-सहन को पर्यावरण से प्रेरित करने के साथ ही आम जीवन में प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग किया जाए। साथ ही पॉलिथीन जैसी दुष्प्रभावी चीजों पर रोक लगाई जाए एवं आवश्यकता होने पर ही जल का इस्तेमाल किया जाए ना कि उसका अंधाधुंध दोहन। साथ ही वे पशु-पक्षी, जिनका कि पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण स्थान है, उन्हें बचाने के उपाय किए जाएं, क्योंकि हर पशु-पक्षी हमें कुछ ना कुछ देते ही हैं, जैसे कि मुर्गी हमें अंडे और गाय-भैंस दूध-दही देती हैं। अत: हमारे आसपास के पशु-पक्षियों को बचाने के उपाय भी हमें सोचने होंगे।
कहने का अर्थ ये है कि अगर हम प्रकृति के साथ गैर जिम्मेदाराना व्यवहार रखेंगे तो आने वाले समय में कहीं मनुष्य ही मनुष्य को खाने के लिए नहीं दौड़ने लगे। ऐसे समय में ही पर्यावरण प्रेमी जीवनदायिनी का काम कर सकते हैं।


बुधवार, 14 अगस्त 2013

सोशल मीडिया या कीचड़ उछालने वाला मीडिया





देश में आगामी लोकसभा चुनाव जल्द ही होने वाले हैं और देशभर में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ताओं की गतिविधियां बढ़ती ही चली जा रही हैं। वहीं आम आदमी की दिलचस्पी अखबारों और न्यूज चैनलों में खबरें देखने और पढ़ने में बढ़ती जा रही है। आज ड्राइंग रूम में होने वाला डिस्कशन वहां से निकलकर पार्टियों और पान की दुकान तक पहुंच गया है।  ऐसे में एक युवा वर्ग देश में ऐसा है कि जिसे राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन ट्वीटर और फेसबुक पर वह हमेशा खोया रहता है। साथ ही कई नेताओं के समर्थक फर्जी आईडी से सोशल मीडिया पर अपने नेताओं का महिमा मंडन करते हैं।  फेसबुक पर दूसरे युवा उनके आर्टिकलों और कार्टून को देखकर मजाक बनाते हैं और देश के राजनीतिज्ञों के प्रति अच्छी छवि नहीं बना पाते हैं। सबसे खराब बात ये है कि एक-दूसरे के प्रति अशोभनीय बातें भी सोशल मीडिया द्वारा पेश की गई होती हैं। उसमें आज हर पाठक वर्ग की राजनीति के प्रति गंदी व स्वार्थी सोच बन गई है। आज हर राजनीतिक दल चाहे वो छोटा है या बड़ा सोशल मीडिया को एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है, लेकिन यहां सोचने वाली बात ये है कि कौन जनता ऐसी है जो कि वोट देकर सरकार चुनती है और कौन वो लोग हैं, जो कि पान की दुकान या गांव की चौपाल पर चर्चा करके खुद को और राजनीतिक दलों को कोसते हैं। अगर आजकल के चुनाव में डलने वाले वोटों का मत प्रतिशत और जीत का अंतर देखें तो पता चलेगा कि जिन लोगों ने अपने प्रत्याशी को जिताया है उनके पास कंप्यूटर तो दूर एक 15 रुपये का पेन भी नहीं होगा। दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद वे 2 जून की रोटी कमा पाते हैं और अपना व अपने परिवार का पेट भर पाते हैं। ऐसे समय में सोशल मीडिया का यूज करने वाला वर्ग तब तक मतदान के प्रति उत्साहित नहीं होगा जब तक कि सोशल मीडिया प्रचार का माध्यम नहीं बन जाता। सही मायने में तो इसे कीचड़ उछालने वाला मीडिया कहा जाना चाहिए। जो व्यक्ति जिस नेता या पार्टी से प्रभावित होता है वही उस नेता या पार्टी का गुणगान करता है और दूसरे दलों को चोर बताने से भी नहीं चूकता है। अगर उस आदमी के बारे में आप जानकारी लेना चाहें तो वो हंसते हुए यही कहेगा कि गुरु कार्टून बहुत अच्छा था, मजा आ गया। यकीन मानिए ऐसा वोटर तारीफ मोदी की करता है और वोट कांग्रेस को देता है।
ऐसे में फिर एक प्रश्न उठता है कि क्या गली-मोहल्ले, पान की दुकानों या चौपालों से उठकर कहीं चुनावी चर्चा (राजनीतिक गलियारों की बातें) फेसबुक पर तो नहीं आ गई। देखने पर तो यही लगता है कि ऐसा ही हो रहा है। ऐसे में चिंतन की बात ये है कि जो विवेकशील लोग हैं, उनकी चेतना व चिंतन कहीं और ना खो जाए क्योंकि आज समाज से इन लोगों का कटाव भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में मीडिया के साथ सच्चे चिंतनशील लोग जो कि धरातल पर रहकर राजनीति में बदलाव और देश का उत्थान चाहते हैं तो सोशल मीडिया को चुुटकुलों का खजाना ना मानते हुए इसे दुधारी तलवार के रूप में स्थापित कर इसका इस्तेमाल करना चाहिए। पढ़ा लिखा और विवेकशील व्यक्ति अगर वो अपनी औकात में आ जाए और अपने विवेक का इस्तेमाल करे तो देश की दिशा और दशा बदल सकता है।
अत: हमारा मानना है कि फेसबुक पर मनमोहन, राहुल और मोदी जैसे लोगों को उपहास का पात्र ना मानते हुए उसकी जगह पर अपने सही विचारों व सच्चे मन से देशहित में अपनी बात समाज में पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए, साथ ही इस बात की भी तैयारी करनी चाहिए कि अगर हम वोट नहीं देते हैं तो किसी पर कीचड़ उछालने या देश का भाग्य कोसने का हमें कोई अधिकार नहीं है।

भेड़ों की भीड़ में कहां है आदमी

वाह रे सोशल साइट फेसबुक, ट्विटर और इन जैसी दूसरी अन्य साइटें। ये साइटें लोगों को स्मार्ट बनाने के साथ ही खबरों व सूचनाओं से हर पल अपडेट रख रही हैं। वहीं इनका एक दूसरा साइड इफेक्ट भी है कि ये परिवार का बजट बिगाड़ने के साथ ही कई युवाओं को अपराध के दलदल में धकेल रही हैं, क्योंकि गर्लफ्रेंड को खुश रखने और उसे महंगे-महंगे तोहफे देने के लिए कई युवा अपराध की राह चुन रहे हैं। तमाम कंपनियों के स्मार्टफोन और नित नए बाजार में आए रहे एप्लीकेशन व सॉफ्टवेयर के कई लोग इतने दीवाने हो गए हैं कि वो अपना सब काम और कारोबार आदि छोड़कर इनसे ही चिपके रहते हैं। आजकल ही ये खबर कहीं पर पढ़ी है कि स्मार्टफोन की बिक्री  ने बेसिक फोन को भी पीछे छोड़ दिया है। शायद ऐसा इसी चलते हुआ है।
वहीं एक दूसरा चलन और शुरू हुआ है कि कई अज्ञानी फेसबुक पर कमेंट लिखकर अपने अ‘ज्ञान’ का बखान करते हैं और कई ज्ञानी उसे पढ़कर अज्ञानी के ज्ञान का आनंद लेते हैं। बड़े ही मजे की बात है कि फेसबुक यूज करने वाले 90 फीसदी लोग, जो कि किसी भी विषय पर लिखते हैं या जिस भी टॉपिक को लाइक करते हैं, उसकी उन्हें मूलभूत जानकारी ही नहीं होती है। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा कहावत के मुताबिक कट और पेस्ट से वो अपने आपको समय-समय पर राष्ट्रभक्त, पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार, धर्मगुरु, डॉक्टर, वकील और ना जाने क्या-क्या खुद को साबित करने की कोशिश करते हैं। यहां पर भी वही बात आती है कि शेर की खाल पहन लेने मात्र से ही कोई भेड़िया शेर नहीं बन जाता।
आज अगर फेसबुक पर तमाम लोग अपनी प्रोफाइल पर 15 अगस्त को राष्ट्रध्वज की तस्वीर या भारत माता की फोटो को अपना सलाम या कमेंट नहीं करते हैं तो ऐसा लगता है कि वो शायद राष्ट्र से प्यार ही नहीं करते। वहीं हकीकत ये है कि अगर इन तमाम लोगों से ध्वज के रंग, उसके महत्व अथवा गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस का मतलब पूछेंगे तो वो इस बारे में बता ही नहीं पाएंगे। अगर इस बारे में सर्वे भी कराया जाए तो मालूम चल जाएगा कि आज देशभक्ति एक हद तक सोशल साइट पर अच्छी डिजाइन वाले फोटो में अपना फोटो लगाकर चिपका देने और उस पर कमेंट या लाइक पाने तक ही है।
बड़ा ताज्जुब तो तब होता है कि जा कुछ लोग जिन्हें कि राजनीति की एबीसीडी भी पता ना हो और वो किसी विश्लेषक की भांति अपनी राय फेसबुक पर लिख देते हैं। ऐसा ही हाल फिल्मों की रिलीज के समय होता है कि जा भाग मिल्खा भाग, चेन्नई एक्सप्रेस या कोई दूसरी ब्लॉकबस्टर मूवी आती है तो फेसबुक फिल्म से संबंधित पोस्ट या कमेंट से पट जाता है। फिल्म के बारे में ऐसा समझ में आता है कि लोगों ने फिल्म देखकर अपनी राय दी होगी, लेकिन सबसे ताज्जुब की बात तो ये है कि संसद की कार्यवाही, या किसी शहर में बलात्कार की घटना, पर्यावरण से संबंधित कोई कार्यक्रम या अन्य कोई आयोजन, इन सभी के लिए फेसबुकिए ठेकेदार ज्ञानी व समाजसेवी बनते नजर आते हैं और अपना ज्ञान बघारते हैं।
एका बात और मैंने गौर फरमाई है कि हरियाली तीज के समय फेसबुक पर झूले और मेंहदी, ईद पर गले मिलने व नमाज पढ़ने, सेवइयां खाने और सिस्टर्स डे वाले दिन सभी लड़कियों को बहन मानने के प्रवचन फेसबुक पर होते हैं। ऐसा करने वालों में से बहुत से लोग मुंह में राम औरागल में छुरी प्रवृत्ति वाले होते हैं। कुछ भी कहिए। कई लोग इस अंधी दौड़ में भीड़ की तरह गड्ढे में गिरते हैं तो कई लोग दूसरे धर्म, जाति, देश, अर्थव्यवस्था आदि का संकलन कर अपने ज्ञान में वृद्धि करते हैं और तो और फेसबुक भी बड़ी ही अनोखी चीज है। आदमी अपने जीवन से जुड़ी छोटी से छोटी उपलधि को भी प्रचार करने के लिए फेसाबुक पर अपलोड कर देता है। आज फेसबुक के चलते लोगों में खुद को पॉपुलर करने की इतनी गजब की भूख बढ़ गई है कि ऊपर वाले पोस्ट के तरीकों के अलावा कुछ लोग तो उलूल-जूलूल बातों व पारिवारिक बातों को भी पोस्ट करने से गुरेज नहीं करते। मेरा मानना है कि एक आदमी के फेसबुक पर तीन आईडी होने चाहिए। इसमें पहले वाले आईडी में उसके फैमिली के सदस्य हों, दूसरे में समाज के लोग व अन्य लोग हों और तीसरी आईडी से उसके निजी वालसखा जुड़े हों, जिनसे कि वो अपनी गोपनीय व निजी बातें शेयर कर सके।
आजा बात चाहे देश की वर्तमान स्थिति, स्वतंत्रता दिवस, दुर्गाशक्ति के निलबन की हो। अगर हम उसे खाली फेसबुक की कमेंट ना मानें और खुद को देश का जिम्मेदार नागरिक मानते हुए उस पर गंभीर व सटीक प्रतिक्रिया जाहिर करें और संपूर्ण भारत में सालभर में मनाए जाने वाले विविध उत्सवों व त्योहारों के महत्व को समझते हुए दोस्तों व दूसरों की प्रोफाइल पर कमेंट करें तो ये सोशल साइट शायद ज्ञान का भंडार साबित होंगी और साथ ही उससे हमारा उपहास उड़ने से बच सकता है।

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

अंधा बांटे रेवड़ी, फिर खुद-खुद को ही दे

किसी भी सिस्टम को चलाने के लिए एक व्यवस्था होती है और व्यवस्था में बैठे लोग उस व्यवस्था को चलाने के लिए निश्चित किए जाते हैं। बात चाहे देश, प्रदेश राज्य या परिवार चलाने की हो। अगर परिवार का मुख्य सदस्य हो तो वो मुखिया, कारोबार का मुखिया मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रदेश का मुखिया सरकार होती है। सरकार का पूरा मंत्रिमंडल होता है, जिसमें अलग-अलग मंत्री के पास अलग-अलग मंत्रालय की जिम्मेदारी होती है। सरकार के नुमाइंदे जनता के वोटों से चुने जाते हैं और सरकार चलाने की जिम्मेदारी जनता के वोटों से निश्चित की जाती है। चुनाव के बाद जो पक्ष जीतता है वो सत्ता पक्ष और दूसरा पक्ष जिसके पास बहुमत नहीं होता है, वो विपक्ष में बैठता है। ये व्यवस्था परिवार या कारोबार चलाने के लिए लागू नहीं होती है, अन्यथा इसके क्या परिणाम होते, ये आप खुद ही समझ सकते हैं।
देखिए देश की जनता का ये कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि जो पक्ष-विपक्ष के लोग सदन में एक-दूसरे के कपड़े उतारने में जरा भी नहीं हिचकते हैं और मर्यादा शब्द की तौहीन करते हुए अनर्गल शब्दों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। हर 15-20 दिन में ही एकाध आदमी जूता फेंकते या मारपीट करता हुआ मिल जाता है। कहीं-कहीं तो चुनावी रंजिश खूनी होली का रूप ले लेती है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद बिना किसी विवि से ली गई डिग्री जैसे उनके नाम के आगे राजनीतिक लग जाता है। ये सभी राजनीतिक दल अपनी चाणक्य नीति खुद ही बनाते हैं और उस कहावत को सच साबित करते हैं चोर-चोर मौसेरे भाई। इसका जीता जागता उदाहरण है हाल में मजबूत आरटीआई (जनसूचना का अधिकार) का राजनीतिक दलों को रास ना आना, दागी राजनीतिज्ञों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था और तीसरा बिंदु जो कि जनमानस से जुड़ा हुआ है रिटायरमेंट और शैक्षिक योग्यता का होना।
ये देश की कितनी बड़ी मजबूरी है कि एक और जहां सरकारी बाबू की नौकरी के लिए उम्र व शैक्षिक योग्यता तय है, वहीं उसकी रिटायरमेंट की आयु 60 साल निर्धारित की गई है। दूसरी ओर वे राजनीतिज्ञ हैं, जो कि जितने बड़े धांधलेबाज और जितना बड़ा गुंडा है, वो उतनी ही दबगई से अपनी बात रख सकता है। ऐसे राजनेता ही तमाम अनैतिक कार्यों से पैसा कमाकर खर्च करने में माहिर हैं और राजनीति के शिखर पर पहुंचते हैं। देशप्रेम की भावना और ज्ञान इस नई व्यवस्था में कहीं खो से गए हैं। ये समझ से परे है कि जो लोग अनपढ़ हैं, वो देश चला रहे हैं। ये देश की कैसे विडांना है। एक ओर तो वो एक-दूसरे को नीचा दिखाने में जुटे हैं। वहीं जा राजनीतिज्ञों के अस्तित्व पर आंच कीाात आती है तो सभी दल एकजुट हो जाते हैं। चाहे वो आरटीआई या दागियों को टिकट दिए जाने कीाात हो। आपको इनकी मानसिकता इसीाात से समझ आ सकती है कि वो देश की सासेाड़ी पंचायत सुप्रीम कोर्ट से भी निाटने में एकजुट हो गए हैं। इनकी मानसिकता, इनके द्वारा की गई करतूत और कालाधन आरटीआई के माध्यम से जनता के सामने ना आ जाए, इसके लिए भी भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में जो जनता है वो अपने साथ किए जा रहे दुव्र्यवहार को कैसे रोक पाएगी कि जा हाल में ही आरटीआई जैसा सशक्त हथियार उसके हाथ में आया था और सुप्रीम कोर्ट के फैसले जो कि जनता के लिए नजीरानते हैं और सरकार जा अपनी ही न्यायपालिका के फैसले पलटेगी, ता हमारे देश और इसकी जनता का क्या हाल होगा। ये स्थिति मनन करने से ही शरीर कांप उठता है।
ऐसे समय पर जो आज के दिन सोशल मीडिया काोलााला है, या जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनकी भी ये जिम्मेदारी है कि सरकार और राजनीतिक दलों की ये मंशा पूरी ना होने दें। चौथा स्तंभ कहे जाने वाले प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को जगाया जाए और सरकार द्वारा अपने पक्ष मेंानाए जा रहे इस कानून को जनता से भी ज्यादा सरकार पर सख्ती से लागू किया जाए।

रविवार, 11 अगस्त 2013

पाक को करारा जवाब देने का सही वक्त

भारत को आजाद कराने के लिए हमारे हजारों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों का बलिदान किया था और सब कुछ देश पर न्यौछावर कर दिया था, तब कहीं जाकर हमें आजादी मिली थी।  इस उपलधि में उस समय के नागरिकों का अपने-अपने स्तर पर भागीदारी व योगदान था। आजादी को पाने में हम किसी के योगदान को कमतर नहीं आंक सकते। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस जैसे वीरों को हम आजादी पाने का श्रेय देते हैं तो मेरे शहर के सेनानियों का भी देश को आजादी दिलाने में योगदान कम नहीं था। आज हर आदमी अपनी मानसिकता व जानकारी के हिसाब से देश को आजादी दिलाने वाले लोगों को सम्मान देता है और सही ठहराता है। वैसे तो विज्ञान के फार्मूले के मुताबिक जब नेगेटिव एनर्जी के साथ पॉजिटिव एनर्जी मिलती है तभी बल्ब जलता है। अगर आज देश के लोग गांधीजी के अहिंसा के तरीके को सही बताते हैं और उन्हें आजादी दिलाने का श्रेय देते हैं तो दूसरी तरफ काफी बड़ी संख्या ऐसे भारतीयों की भी है जो कि सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारों से आज भी सहमत हैं।  आज भी इन लोगों की संख्या अहिंसा के अनुयायियों से कहीं ज्यादा होगी। अगर इन क्रांतिकारियों ने अपना लहू नहीं बहाया होता या अंग्रेजों पर अटैक की नीति नहीं अपनाई होती तो शायद हमें आजाद होने में और ज्यादा समय लगता। सीधा तात्पर्य ये है कि प्यार के साथ मार का भय होना भी आवश्यक है। यहां मुझे एक कहावत याद आती है कि
किसी की सज्जनता को उसकी दुर्बलता मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।
आज के समय में पाकिस्तान जिस तरीके से अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है और उसके प्रति जो हमारी सरकार का रवैया है। उससे स्वर्ग में बैठे बोस, आजाद और उन जैसे क्रांतिकारियों को काफी तकलीफ होती होगी कि आज हमारे देश की ये कैसी सरकार है कि इसे ये नहीं मालूम कि जिसकी लाठी उसकी भैंस। बड़े ही ताज्जुब की बात है कि कांग्रेस के ही एक पूर्व प्रधानमंत्री लालाहादुर शास्त्रीजी जो कि देखने में साधारण से किसान लगते थे। उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में भारत-पाक की लड़ाई के दौरान भारत के सम्मान के लिए अमेरिका जैसे ताकतवर देश को भी दरकिनार कर दिया था, जबकि भारत को उस लड़ाई के लिए काफी खर्च उठाना पड़ा। इस युद्ध में जब पाक को हार करीब लगी तो उसने अमेरिकी दरबार में दौड़ लगाई और खुद को बचाने की अमेरिका से गुहार की। उस युद्ध में हमारे सैनिक लाहौर के काफी करीब थे और जंग अगर और चलती तो शायद आज लाहौर पर तिरंगा फहरा रहा होता। उस समय अमेरिका ने भारत पर ये दबाव बनाया कि अगर उसने युद्ध नहीं रोका तो वह भारत को गेहूं की सप्लाई रोक देगा। इस पर स्वाभिमानी शास्त्रीजी का जवाब था कि सड़ा हुआ गेहूं खाने से तो अच्छा है कि हम भूखे ही मर जाएं। उनके इस जवाब से मेरे मन में उनकी लौह पुरुष की छवि आज भी अंकित है। शास्त्रीजी ने तुरंत ही देशवासियों से अपील की कि देशवासी सोमवार का व्रत रखें और अनाज बचाकर लड़ाई में सहयोग करें। इस निर्णय के गवाह आज भी कई कांग्रेसी होंगे, जो कि उस समय शास्त्रीजी की सरकार में मंत्री या संगठन में किसी पद पर रहे होंगे।
आज की परिस्थितियों को देखते हुए मन में ये विचार कौंधता है कि आजादी के समय और बाद में जो गलती नेहरुजी ने की उसका परिणाम हम लोग आज भी भोग रहे हैं। कहीं वही गलती वंशानुगत राजनीतिक परिवार द्वारा तो नहीं की जा रही। ऐसे में सरकार में बैठे पक्ष-विपक्ष के लोगों को भारतीय जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए और देश के वीर लालों को मरने सेाचाना चाहिए। अगर आज भी केंद्र सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए मात्र शांति वार्ता ही करते रहे तो पाकिस्तान जैसा दुष्ट राष्ट्र कहीं इस कहावत को चरितार्थ ना कर दे। शेर आया, शेर आया और वास्तव में ही एक दिन शेर गांव में आ गया। अत: हमें पाकिस्तान को साक सिखाना चाहिए और फस्र्ट एंड लास्ट  या आर-पार की लड़ाई लड़नी चाहिए। इसके लिए देश का प्रत्येक नागरिक चाहे वो किसी भी क्षेत्र का हो अपनी ओर से हरसंभव मदद करे। आज पाकिस्तान को साक सिखानााहुत जरूरी है क्योंकि जिस तरीके से चीन भी आजकल भारत में घुसपैठ कर रहा है उससे चीनी सीमा से सटे भारतीय इलाकों में रह रहे लोगों की नींद हराम हो गई है। आज केंद्र सरकार को देश के आत्म सम्मान कोाचाने के लिए करो या मरो की नीति नहीं,ाल्कि देश की खुशहाली और शांति से जीने की लड़ाई शुरू कर देनी चाहिए। साथ ही पाकिस्तान को जवाा देना चाहिए कि तुम अगर एक मारोगे तो हम 10 मारेंगे। आ ये फैसला कहानी-किस्सों से नहीं मिटाया जा सकेगा। आ उचित निर्णय लिए जाने का वक्त आ गया है। 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख जेब में माया


किसी भी देश की शक्ति वहां के नागरिक होते हैं। अगर हम स्वस्थ भारत के निर्माण की अपेक्षा करते हैं तो हमें ये तय करना होगा कि अपने नौनिहालों को उनके विकास के लिए दो महत्वपूर्ण चीजें अवश्य मुहैया कराएं। पहला भोजन और दूसरा बौद्धिक विकास। बच्चे का बौद्धिक विकास उसे घर व स्कूल में मिलने वाली शिक्षा से होता है। इसी प्रकार स्वस्थ शरीर के लिए अच्छा भोजन करने से ही स्वस्थ शरीर बनता है। हमारे देश में एक मुहावरा प्रचलित है.

पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख जेब में माया

आजकल भारतीय व्यंजन के स्थान पर पाश्चात्य भोजन बड़ी तेजी से जगह बनाते चले जा रहे हैं। पुराने जमाने में आदमी अच्छा भोजन खाने के साथ ही सुबह-सुबह व्यायाम भी करता था। इस चलते उसे वृद्धावस्था में भी आजकल की नई-नई बीमारियां छू भी नहीं पाती थीं और वो आज 80 साल की आयु होने के बाद भी किसी नवयुवक की ही भांति काम करता है। आज की पीढ़ी के जो बच्चे हैं, वो भले ही अपने पैरों से ठीक से चलना भी ना सीख पाते हों, लेकिन वे जंक फूड खाने के लिए लालायित रहते हैं। हाल ये है कि उन्हें सभी तरह के जंक फूड के नाम अच्छे से पता हैं। यदि आप खाने की मेज पर दूध, शिकंजी, लस्सी या ठंडाई रख दें और इसके दूसरी तरफ कोल्ड ड्रिंक्स तो ये तय मानिए कि बच्चा कोल्ड ड्रिंक्स ही पसंद करेगा। इसी तरीके से आप उसे घर में बनीं मठरी या आलू का परांठा देंगे तो वो इन्हें देखकर नाक-भौं सिकोड़ेगा और बर्गर-सैंडविच की मांग करेगा। फास्ट फूड के सारे स्वाद उसे इतने ज्यादा पसंद है कि अब तो 24 घंटे ही उसे यही सब चीजें खाने को चाहिए।
शहर में आज जितने भी पब्लिक स्कूल हैं, उनका यदि सर्वेक्षण किया जाए तो वहां चलने वाली कैंटीन बर्गर, सैंडविच, पेटीज आदि से पटी होंगी और वहां लस्सी या ठंडाई की जगह कोल्ड ड्रिंक्स आसानी से मिल जाएंगी। आज बच्चे स्कूल के लंच टाइम में कैंटीन में से जंक फूड ही लेकर खाते हैं और जो बच्चे घर से खाना लाते हैं उनके टिफिन में भी फास्ट फूड ही मिलता है। जंक फूड ना तो सुपाच्य होता है और ना ही सेहतमंद।
आज भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने आप को समाज में आधुनिक कहलाने की होड़ में बच्चों के टिफिन से पौष्टिक भोजन जैसे आलू का परांठा, घर में बनी नमकीन, रोटी, फल व हरी सजियां तो जैसे गायब सी ही हो गई हैं। आज ये वास्तविकता है कि टीवी के माध्यम से विदेशी कंपनियों ने अपने उत्पादों का धुआंधार प्रचार करके और तरह-तरह की लुभावनी स्कीमों से भारतीय भोजन को इतना पीछे छोड़ दिया है कि शायद आज की जनरेशन भारतीय व्यंजनों के नाम और स्वाद भी ना जानती हो। आजकल के बच्चों को पिज्जा तो खाने को रोज चाहिए, लेकिन तीज त्योहारों पर चाव से खाने वाले घेवर जैसी मिठाई को देखकर वो मना कर देते हैं।
कहते हैं कि बुरी चीज का समय ज्यादा नहीं रहता। अत: तमाम मेडिकल रिपोर्टों के बाद भी डॉक्टर हर परिवार और हर मरीज को जंक फूड व फास्ट फूड से बचने की सलाह दे रहे हैं। जंक फूड के बुरे परिणाम देखकर केंद्र सरकार भी जागृत हो गई है और केंद्रीय खाद्य मंत्रालय की ओर से जंक फूड की बुराई और स्कूल-कॉलेजों में इस तरह के खाने की बजाए हरी व पत्तेदार सब्जियां, दूध-दही, फल व अंडे जैसी चीजें कैंटीन में रखे जाने के निर्देश दिए जा रहे हैं। साथ ही सरकार ये भी सिफारिश कर रही है कि कैंटीन में इन चीजों को बच्चों के लिए सस्ते रेट पर उपलध कराया जाए।
सूत्रों के मुताबिक अगर दिल्ली हाईकोर्ट ने इस प्रस्ताव पर मंजूरी दे दी तो सरकार इसे सभी स्कूल-कॉलेजों में सख्ती से लागू कराएगी। यहां पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर का उदाहरण प्रासंगिक है कि जहां के डीएम ई नरहरि (आईएएस) ने वहां एक आदेश जारी कर स्कूलों में जंक फूड बेचे जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था और ऐसा करते पाए जाने पर स्कूल के साथ-साथ शिक्षा विभाग के अधिकारियों (जो इस योजना के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार हैं) के खिलाफ भी कार्रवाई किया जाना सुनिश्चित किया था। जंक फूड के प्रति डीएम नरहरि की संवेदनशीलता इस बात से पता चलती है कि उन्होंने इसके खिलाफ प्रचार फेसाबुक पर बनाए गए प्रशासन के पेज और अपने निजी पेज पर भी किया था। साथ ही सभी अभिभावकों से भी निवेदन किया था कि अगर वो अपने बच्चे या किसी अन्य स्कूल में भी फास्ट फूड बिकता हुआ देखें तो इस बारे में तुरंत उन्हें सूचित करें। उनका नाम गुप्त रखते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अगर हम अपने नौनिहालों को स्वस्थ देखना चाहते हैं तो कॉलेज या जिला प्रशासन के ऊपर जिम्मेदारी ना छोड़कर हमें भी जंक फूड के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और सरकार से इस तरीके के फूड बेचने वाली कंपनियों को भारत में आने से रोकने के लिए कहना चाहिए। तभी हम अपने देश व परिवार को हष्ट-पुष्ट और स्वस्थ देख पाएंगे। ग्वालियर के डीएम की इस पहल को अनुकरणीय मानते हुए स्थानीय प्रशासन को आगरा में भी ऐसा ही उदाहरण पेश करना चाहिए।

अभावग्रस्त प्रतिभाओं को मुहैया कराएं उचित प्लेटफार्म

हालिया उपलधियों के सफर पर अगर गौर फरमाएं तो उसमें 90 फीसदी अभावग्रस्त और पिछड़े लोगों ने एक मुकाम हासिल कर गांव शहर और देश का नाम रोशन किया। साफ तौर पर हम ये कह सकते हैं कि पिछड़े इलाकों की वो प्रतिभाएं दो जून की रोटी और अन्य सुविधाएं ना होते हुए भी विश्व पटल पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर देश का नाम रोशन करती हैं। यह कहानी आज की नहीं है, ऐसा निरंतर देखने को मिल जाएगा। किसी भी क्षेत्र का धु्रव तारा हो, उसने सामाजिक, आर्थिक और पिछड़ेपन से लड़कर अपने पसंद के क्षेत्र (खेल, मनोरंजन, विज्ञान, शिक्षा आदि) में उपलधि हासिल की है।
इसका ताजा उदाहरण झारखंड की आदिवासी लड़कियां हैं, जिन्होंने कि देश के राष्ट्रीय खेल कहे जाने वाले हॉकी की विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का  जलवा बिखेरा। ये तमाम लड़कियां उन जगहों से आती हैं कि जहां रोजगार के माध्यम ना के बराबर हैं और वहां लड़कियों की तस्करी और बाल विवाह आम हैं। राज्य व केंद्र सरकारों के असहयोग रवैये के बावजूद हमारी ये मेधाएं अपनी लगन और हौसलों से अपनी जगह बना पाती हैं। ऐसी ही प्रतिभाओं के लिए किसी शायर ने कहा है

परों से नहीं हौसलों से उड़ान होती है
आसमां में एक पत्थर तो उछालो यारो।

हमारे आसपास के क्षेत्र में ही इस तरह के सैकड़ों उदाहरण इतिहास के पन्नों में कैद हैं। अगर हम आगरा मंडल और उसके आसपास की जगहों की ही बात करें तो हाल में ही खेल जगत में मथुरा की अनीता, आगरा का जिम्नास्ट boby, नृत्य में स्पर्श श्रीवास्तव और गायन में हेमंत ब्रजवासी, सोलर कार बनाने वाले धीरज मिश्रा और इनसे भी एक कदम आगे आठवीं पास एक जूते के कारीगर ने जूते की तकनीक पर किताब  लिखकर अपनी बौद्धिक क्षमता का बेजोड़ उदाहरण पेश किया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण, मंडल, प्रदेश, राज्य, देश और विदेश में कार्यरत हैं। हम इनकी अभावग्रस्त जिंदगी और बिना कोई निर्देशन व सरकार व प्रशासन के असहयोग रवैये, भ्रष्टाचार और कई प्रतिभाओं को अन्य प्रकार की कई परेशानियों की खबर आए दिन अखबारों में पढ़ते हैं। इसके बावजूद अपनी ये प्रतिभाएं अपने बल पर अपनी मंजिल पा ही लेती हैं। जब  इन प्रतिभाओं की जुबानी उनके अभाव और शोषण की कहानी सुनते हैं कि कैसे ये राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद से लड़कर अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं तोास आंखों से आंसू निकल आते हैं औ मन करता है कि ऐसी प्रतिभाओं को अगर हम कुछ और नहीं दे सकते तो कम से कम सम्मान देकर उनकी हौसला अफजाई तो कर ही सकते हैं। ऐसा करके हम अपने आसपास एक और ‘एकलव्य’ पैदा करने में अपनी भूमिका निभा ही सकते हैं, लेकिन आज भारत की वर्तमान व्यवस्था में ऐसे लोग चार दिन की चांदनी की तरह टिमटिमाते हैं और अपने जीवनयापन के लिए लड़ते-लड़ते मर जाते हैं। उनोचारों की दुर्दशा और स्थिति ऐसी हो जाती है कि वो किसी के आगे रो भी नहीं पाते हैं। अगर हम भारत को ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता में क्षितिज पर देखना चाहते हैं तो सरकार के साथ ये हमारी जिम्मेदारी है कि अभावों व तंगी केाावजूद ऐसी वर्तमान व भावी प्रतिभाओं को हम सही दिशा, निर्देश, आर्थिक-तकनीक सहयोग के साथ ईमानदारी सेािना किसी भेदभाव के उनकी प्रतिभा निखारने में सरकार के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाएं ताकि भविष्य में किसी भीाड़ी स्पर्धा में ये प्रतिभाएं असफल ना हों। खैर जो भी हो हम ऐसी प्रतिभाओं को सैल्यूट करते हैं।
लेखक का आगरा के लोगों से निवेदन है कि राष्ट्रहित में ऐसी प्रतिभाओं को उभारने के लिए शासन-प्रशासन से उन्हें मदद उपलध कराएं। साथ ही ऐसी व्यवस्थाानाएं कि इन प्रतिभाओं को रोजगार के स्थायी साधन भी उपलध हों।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

माँ बाप के सपने और बचपन


 किसी भी बच्चे का मन और तन किसी कुम्हार की गीली माटी की तरह होते हैं कि जिसे जैसा चाहे और जिस आकार में  चाहे ढाला जा सकता है। दादा-दादी की बात हो या डॉक्टर्स की ओर से कराया सर्वे सभी का एक  ही कहना है कि  बचपन पौष्टिक आहार खाने, खेलने-कूदने और ज्ञान का भंडार लेने के लिए होता है। बचपन का खाया हुआ और सेहत के लिए खेल के मैदान से हमजोली करना और बौधिक विकास के लिए ज्ञान प्राप्त करते हुए अपनी युवावस्था को प्राप्त करना सर्वोत्तम होता है, जो कि जीवन पर्यन्त काम आता है, लेकिन आज अपने आप को, अपने बच्चे को इन सब चीजों से दूर रखकर हथेली पर सरसों उगाने की तरह उसे कमाऊ पूत  के साथ समाज में एक  तारे की तरह चमकाने की होड़ बढती ही जा रही है। आज ढाई या साढ़े तीन साल की आयु में  ही बच्चे को पब्लिक स्कूल में  एडमिशन दिला दिया जाता है, जबकि आज से 4 दशक पहले 4-5 साल का होने तक भी बच्चे को स्कूल नहीं भेज जाता था और वो घर पर ही मातृत्व सुख का आनंद लेता था।
आज साढ़े तीन साल की उम्र में  बच्चे का स्कूल में  एडमिशन करा देना सामान्य सी बात है। कहीं कहीं तो बच्चा ठीक से खड़ा होना भी नहीं सीखता है और उससे पहले ही उसके माँ-बाप उसे किसी न किसी फील्ड के सितारे की तरह देखने लग जाते हैं जैसे कि उनका बच्चा क्रिकेट में  सचिन तेंदुलकर, टेनिस में  सानिया मिर्ज़ा, बैडमिंटन में  saina nehwal या और किसी खेल का चमकता हुआ सितारा बने। माँ-बाप की कमोबेश ऐसी ही सोच फिल्म लाइन को लेकर भी है कि उनका बच्चा फिल्मों में  शाहरुख़ खान या करीना कपूर की तरह बड़ा स्टार बने। इस तरह की सोच से वो अपनी विलासिता और सामाजिक प्रतिष्टा का एक  खाका खींच लेते हैं। इस तरह की सोच में TV  ने अमरबेल की तरह काम किया है। आज किसी न किसी चैनल पर बच्चों की प्रतियोगिता का आयोजन करके माँ बाप के मन में  ऐसी सोच को बढ़ावा देने का बड़ा हाथ है। कहीं टैलेंट हंट तो कहीं सिंगिंग और डांस competetion जैसे अनेक आयोजन हो रहे है। चाहे TV पर सास-बहु का सीरियल हो या कोई और जब तक उसमे ४-५ बच्चे नहीं होते हैं तो सीरियल पूरा ही नहीं माना जाता है। ऐसे समय में  इन सारी चीजों को देखते हुए लगता है कि एक ओर  तो हम बाल श्रम कानून लागु कर उसे अमल में ला रहे हैं तो दूसरी ओर  इन सब चीजों को बढ़ावा देकर अपनी कब्र खुद ही खोद रहे हैं। क्या इसे सरकार की दोगली नीति नहीं मानना चहिये। एक  ओर तो वो गरीब परिवार जो अपने बच्चों को पढाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक अभाव के कारण उसके बच्चे को किसी चाय, पंक्चर की दूकान पर छोटू या मुन्ना बनना पड़ता है और श्रम विभाग छापा मारकर उनका उत्पीड़न करता है। सरकार की अनेक बाल श्रम योजनाएं जो कि  समय-समय पर लागु की जाती हैं, जिससे बच्चे शिक्षित और सेहतमंद बनें। मिड-डे माल भी ऐसी ही परियोजनाओं में  से एक  है।
बाल श्रम के उद्धार के लिए हर मोहल्ले में एक  सामाजिक संस्था अपना झंडा उठाये देखने को मिल जाती है, लेकिन ये कितना, कहाँ और कैसे काम करती हैं ये जानना और भूसे के खेत में  सुई खोजना एक  बराबर है।
बड़े ही आश्चर्य की बात लगती है कि  सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं का ध्यान समाज में  पैदा होते या बाल बाल कलाकार के रूप में  काम करते हुए इन नौनिहालों की ओर  नहीं है. क्या ये बाल श्रम कानून के तहत नहीं आते हैं। ऐसा हो या न हो लेकिन आज माँ-बाप को भी ये सोचना चाहिए कि एक  तय आयु सीमा के बाद ही बच्चे में छिपी प्रतिभा को निखारने या तराशने का काम करना चाहिए चाहे वो प्रतिभा खेल, गायन या और किसी क्षेत्र से क्यों ना जुडी हुई हो। उन्हें इस बात को भी समझना चाहिए कि  गुदड़ी के लाल छिपाए नहीं छिपते हैं. अतः सही समय पर उन्हें गीली मिट्टी की तरह आकार देना चाहिए।
मेरा सभी सामाजिक और बाल श्रम उन्मूलन से जुडी संस्थाओं, प्रशासन और शासन से अनुरोध है कि  वो इस तरीके से बाल कलाकारों जो कि  बाल श्रम कानून के तहत नहीं आते हैं तो उन्हें लाया जाये और उनका बौद्धिक और शैक्षिक विकास कराया जाए ताकि हम भविष्य में एक  सुनहरे भारत के निर्माण की परिकल्पना कर सकें।



















सोमवार, 5 अगस्त 2013

आज दोस्ती में दिख रहा बनावटीपन






सुदामा कृष्ण की दोस्ती की मिसाल आज भी साहित्य  और धर्म के ग्रंथों में कैद है, जो ये बताती है कि  दोस्ती की कोई सीमा नहीं होती। वो किसी भी धर्म, जाति,देश और आर्थिक असमानताओं की बेड़ियों को तोड़कर मन के मिलन पर होती है. उसमें बौद्धिक क्षमता        का भी कहीं कोई ओर छोर  नहीं होता है. दरअसल मानव जाति  विकासशील प्रवत्ति की है और सदियों से ही इसका धीरे धीरे विकास होता रहा है, जिसमे कि १ पुरानी परम्पराएँ और व्यस्थाएं बदलती रहती हैं।  अगर हम पुराने ज़माने (बाप-दादा या उससे भी पहले ) की बात करें तो उस समय के आज भी कई ऐसे उदहारण मिल जायेंगे जिनमे कि दो   अलग अलग मान्यता और आर्थिक असमानता और बौद्धिक क्षमता के लोग आज भी उनकी उस दोस्ती का निर्वहन करते दिख जाएंगे। मैं ऐसे कई परिवार के लोगों को जानता हूँ कि  जो आज वरिष्ट नागरिक हैं, उनके बाप दादाओं ने उन लोगों की खूब आर्थिक मदद की और वो मददगार परिवार  आज आगरे का नामी परिवार है. ऐसे कई लोगों को मैं जानता हूँ जिनकी कि दोस्ती को आज 50 साल हो गये हैं. इनमें से कई ऐसे भी हैं जिनकी की दोस्ती  आगरा से बाहर रहने पर भी अक मिसाल है।  सबसे बड़ी बात ये है कि  पैसे और पद की विषमता के बाद भी वो अपनी दोस्ती और दोस्त को सार्वजनिक रूप से मिलवाते हैं और अपने दोस्त को स्वीकार करते हैं.
आज आर्थिक उन्नति और शैक्षिक  द्रष्टि से इस सभ्यता ने एक  नया मोड़ ले लिया है. अब दोस्ती का पहलू उसका बौद्धिक या आर्थिक स्तर, पद या समाज में स्थान, दोस्त बनने  लायक है या नहीं, ये सारी बातें तय करती है. दोस्ती जो कि  एक  ज़माने  में गंगाजल की तरह पवित्र हुआ करती थी उसमें आज कहीं न कहीं स्वार्थ रूपी कीड़ा घुस गया है. दो दशकों से तो दोस्ती की परिभाषा ने ऐसी करवट बदली है कि आज सुदामा और कृष्ण भी ये कहने से गुरेज नहीं करते होंगे कि  देखो आज दोस्त के रूप में  आस्तीन के सांप पल रहे हैं. क्योंकि अब बौधिक और आर्थिक पद की समानता को स्वार्थ ने पीछे छोड़ दिया है. अब दोस्ती केवल मतलब की ही रह गयी है. 
आज के संचार के युग में एक  रूप में  और दोस्ती के मायने बदल गए हैं  जिसे कि  आज फेसबुक फ्रेंड के रूप में  जाना जाता है. आज फेसबुक पर दोस्ती कम और अपने आपको ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपना प्रभाव जमाना और दोस्तों  की संख्या बढ़ाना है, फिर चाहे उसके लिए उलजुलूल    बातें या  अपने परिवार की निजी बातों को भी फेसबुक पर डालने से लोगों को कोई गुरेज नहीं है और ऐसे लोग बड़े गर्व से कहते हैं की फलां मेरा     दोस्त है. दोस्ती का मतलब होता है कि  दोस्त की मन और आत्मा से जुड़ना। फेसबुक पर जुड़ना या अन्य किसी संचार माध्यम से जुड़ना या अपने मतलब के लिए दोस्ती गांठना मित्रता नहीं कहलाता। किसी ने सुच ही कहा है कि  हे इश्वर मुझे दोस्तों की फ़ौज मत दे बल्कि एक  ही ऐसा दोस्त दे जो  कि  पूरी फ़ौज के बराबर हो. इसलिए   फ्रेंडशिप डे के मौके पर सभी दोस्तों और पाठकों से कहना चाहता हूँ कि  अगर आपका दिल मेरे रहन-सहन, आर्थिक बौद्धिक स्तर की जगह मन और आत्मा से मिलता है तो आप मुझसे दोस्ती रखें और दोस्ती को मैं अपने मरने के बाद भी जीवित रखूँगा।                                                                                                          दोस्ती का असली आनंद दोस्ती के बीच हंसी ठिठोली में  ही है और एक  व्यक्ति अपने मित्र से दिल की बात कहकर अपने मन को हल्का कर लेता है, लेकिन आज ऐसा बहुत कम हो रहा है और इसी चलते आज कई बार     आदमी dipresion में  चला जाता है।
















                        

बढती आत्महत्या की घटनाएँ, जिम्मेदार कौन


आज आये दिन अखबारों में  पढने को मिलता है कि  परीक्षा में  पास नहीं होने, काम नहीं चलने या आर्थिक तंगी जैसे कारणों से फलां आदमी ने आत्महत्या कर ली. आस-पड़ोस में  रिश्तेदारी, और शहर में  ऐसी घटनाएँ बढती ही चली जा रही हैं. मन में  विचार कौंधता है कि  हर रोज आदमी क्यों आत्महत्या का रास्ता अपनाता जा रहा है. दिमाग में  तुरंत ये विचार आता है कि  भागदौड़ भरी जिंदगी में  no 1 बनने की परिवार की चाहत, समाज में  गलाकाट प्रतिस्पर्धा, कमरतोड़ महंगाई, अवसरों के अभाव के साथ खुद से संतुष्ट न हो पाना ये चाँद कारण है जिनके चलते मजबूर होकर आदमी आत्महत्या को मजबूर होता है. वो समय्बहुत ही दिल दहलाने वाला होता है कि  जब बूढ़े माँ-बाप का इकलौता बीटा रैगिंग से त्रस्त होकर पैसे के आभाव के बावजूद पढाई पूरी होने पर भी नौकरी न मिलने के कारन खुद को दोषी मानते हुए मौत को गले लगा लेता है और बूढ़े माँ बाप को मानसिक और  शारीरिक रूप से जीवन भर का कष्ट देकर चला जाता है. ऐसी घटनाओं को पढ़ते समय दिमाग में ये विचार आता है कि वे माँ बाप जो कि  खुद कुछ नहीं कर पाए उन्हें अपने बच्चों से अत्यधिक उम्मीदें करना उचित है. नए नए खुले पब्लिक स्कूल जहाँ कि  भाईचारे का अभाव है वहां पढाई का बोझ और नए tichers का सरेआम स्टुडेंट्स को परेशान करना या tution के लिए दबाव बनाना कितना उचित है. कुकुरमुत्तों की तरह से     प्रोफेशनल कोर्सेज की दूकान खोलकर उन्हें उन्ही के हाल पर छोड़ देना क्या सही है. ऐसे समय में इन सब बातों के साथ भारत में  आरक्षण, भाई भतीजावाद जाती धर्म का दंश जब होनहारों को झेलना होता है तो उसके पास सिवाय आतमहत्या के और कोई चारा नहीं बचता है ये तो बहुत बुरा हुआ अखबार में  पढने के बाद हम केवल    इतना भर कह कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेते हैं.
ऐसे समय में  हमारे मन में ये प्रश्न आया कि क्या इसमें दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी सामाजिक असमानता आरक्षण गलाकाट प्रतिस्पर्धा  तो वजह नहीं है. मन में  इसका जवाब आता है हाँ. मुझे इन सब बातों के साथ एक  बात और समझ आती है जो कि  विचार करने योग्य है. बढ़ते हुए एकल परिवार तो कहीं इस समस्या का मूल कारन तो नहीं है क्योंकि पहले सामूहिक परिवार होते थे और हर सुख-दुःख, समस्या और अपनी इच्छाओं की पूर्ति को किसी न किसी माध्यम से सुलझा ही लेते थे. आज बड़े परिवार धीरे धीरे हम दो और हमारे दो  तक ही सीमित रह गए हैं. कई एकल परिवार ऐसे हैं कि  जिनमे माँ या बाप दूसरे शहर में  नौकरी करते हैं या सुबह से शाम तक  ऑफिस में  बिजी रहते हैं, इससे इन परिवारों में  बच्चा मानसिक रूप से आत्मविश्वासी नहीं बन पाता है. कुछ अभिभावक तो अपने बच्चों को बोर्डिंग स्कूल में  भेज देते हैं। आज भरे पूरे परिवार (दादा-दादी, चचा चाची) तो दूर बच्चे अपने माँ बाप के स्नेह से भी दूर हो जाते हैं और बेहतर भविष्य बनाने की चिंता में   हमेशा दबाव में  रहते हैं और छोटी छोटी घटनाएँ भी उन्हें हिलाकर रख देती हैं. आजकल सड़क छाप रोमियो भी आत्महत्या करते नजर आते हैं, जबकि पहले सामूहिक परिवार में  बहन-भाभियों के साथ वो अपनी इच्छा जाहिर करके ऊँच नीच में  फर्क कर लेते थे. इसी तरह से सरकारी स्कूल में यूनिफार्म का सिस्टम था, वहां पर नैतिकता, आत्मविश्वास और भाईचारे का पाठ पढाया जाता था और वहां के गुरु भी स्टूडेंट्स की समस्या हल करने को सदैव तत्पर रहते थे.
अतः मुझे लगता है कि  एकल परिवार की जगह हम सामूहिक परिवार में  रहें तो भरण पोषण की समस्या और आत्मविश्वास की जड़ें मजबूत की जा सकती है. ऐसा करके हम आत्महत्या रूपी भस्मासुर पर रोक लगायी जा सकती है.







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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

आखिर किस दिशा में जा रहे हैं हम

सभ्यता और तहजीब ये दो वस्तुएं मानव के वो आभूषण हैं जो कि  कंगाल को अमीर और अमीर को कंगाल, निरक्षर को साक्षर और साक्षर को निरक्षर बना देते हैं. तालीम की उंची-उंची  डिग्री और विवि  का आज जिस तरीके से विस्तार हो रहा है और आदमी पढाई पूरी होने के  बाद मानव होने के प्रमाण दे रहा है और अपने ज्ञान से समाज को लाभान्वित कर रहा है उसके दो पहलु हैं. एक  पहलू  ऊपर वाला हिस्सा है तो दूसरा हिस्सा इन सब ज्ञान और पद को प्राप्त करने और सामाजिक स्थान पाने के बावजूद भी अपनी जबान से इतनी  और गैर जिम्मेदारी के साथ सामाजिक व्यस्थाओं और नारी के प्रति अशोभनीय बात उगलकर असभ्यता का परिचय दे रहा है. अगर हम देखें तो रोज ही कोई न कोई ऐसा अशोभनीय वकतव्य कहीं न कहीं किसी अखबार के मार्फ़त हम लोगों की जानकारी में  आता है, जैसे हाल ही में  एक  वरिष्ट केंद्रीय मंत्री जयराम नरेश ने एक  मोती डॉक्टर को eyecamp में  road रोलर कहा था. कांग्रेस  के एक  महा सचिव तो अक्सर किसी न किसी  के खिलाफ अशोभनीय टिप्पणी  करते ही रहते हैं
हमारा प्रदेश भी इस मामले में  पाकसाफ नहीं है. बात चाहे पूर्ववर्ती सरकार  की हो या वर्तमान सरकार  की. वर्तमान सरकार के एक  मंत्री भी अपने गृह जनपद में महिला  डीएम के प्रति अशोभनीय टिप्पणी कर अपनी ही किरकिरी करा चुके हैं. वैसे इस तरह का चलन तो बॉलीवुड में  भी खूब है. जहाँ अभिनेताओं द्वारा अपने विरोधी अभिनेताओं के बारे में  अनर्गल बातें कहकर खूब सुर्खियां बटोरी जाती है. इस कड़ी में  समाज का जो पढ़ा लिखा तबका है वो भी अछूता  नहीं है. बंद कमरे में  याआपस में  इस तरह की टिप्पणी दोस्तों के बीच  तक तो ठीक है, लेकिन सामाजिक प्लेटफार्म या कार्यस्थल पर ऐसी टिप्पणी सामने वाले को iritate करती है. कई बार देखा गया है कि  ऐसी घटना के पीड़ित कई दिनों तक मानसिक वेदना को झेलते हैं और उन्हें डॉक्टर की सलाह की भी जरुरत भी पड़ती है.
यहाँ ये प्रश्न उठता  है कि कोई कॉमन मैन ऐसा बयां देता है तो समाज का सभ्य  तबका उसे जाहिल और गवांर कहकर उसे कोसता है. ऐसा करके वो खुद को पाक साफ़ दिखाने  की कोशिश करता है. जो लोग समाज को एक  दिशा देने का काम करते  हैं उनकी टिपण्णी पर या तो हम उनके जिन्दादिली की बात कहकर तालियाँ बजाते          हैं या आम आदमी मन मसोस कर रह जाता है. यहाँ ये सवाल है कि  ऐसी टिप्पणियां क्या मनोवैज्ञानिक विकार हैं या अपने पद की हनक. ऐसे में  निश्चित रूप से एक  मुहावरा याद आता है कि
                                                               
                                                 तुम कहो तो 'राम' और हम कहें तो 'मरा'     







                                                                                                                                                                                                                                                   

कितनी जायज है छोटे राज्यों की मांग


छोटे राज्य की मांग स्वार्थ की पूर्ति है या सुशासन की इच्छा, लेखक कि  समझ से ये बात परे है.ऐसा इसलिए क्योंकि अगर हम ये मानते हैं कि  भारत की जो संस्कृति है उसका विश्व में  कोई तोड़ नहीं है तो भारत में  अलग-अलग राज्यों की मांग बेमानी है. क्योंकि भारत में  सामूहिक परिवारवाद के कारण  हर समस्या से लड़ना और कोई भी भूखा न सोये इस बात का ध्यान रखना ये मौलिक अनुभूति के साथ ही समाज में  एक  मजबूत परिवार की छवि पेश करता है. यहाँ ये बात गौर है करने लायक है कि  बचपन में  एक  कहानी पढ़ी थी   कि  एक  पिता अपने को लकड़ी का खुला हुआ गट्ठर देता है और कहता है कि  लकड़ी को एक -एक  कर तोड़ो और बीटा ऐसा ही करता है तो साडी लकडियाँ  टूट जाती हैं. इसी क्रम मैं हम अंग्रेजों  के किए  हुए कृत्यों को आज भी संस्मरण की तरह याद करते हैं की उन्होंने फूट  डालो और राज करो की नीति  से देश पर राज किया था. अंग्रेजों  के आने से पहले तत्कालीन राजाओं की अदूरदर्शी नीतियों के चलते भारत छोटे-छोटे राज्यों में  बंटा  था. अंग्रेजों ने इसका भरपूर फायदा उठाया और डिवाइड एंड रूल की नीति  से राजाओं को आपस में  लड़वाकर  देश पर आधिपत्य किया और भारतीयों  को राजबहादुर जैसी उपाधि देकर अपने हितों की पूर्ति की. 
आज बड़ा सवाल ये है की क्या वर्तमान राजनीती भी कहीं उसी ओर तो नहीं जा रही है और कहीं प्रत्येक दल के नेता अपने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अलग-अलग लकड़ियों के गट्ठर के रूप मैं पेश करके राज्यों का बंटवारा कर अपनी राजनीतिक और अलग अलग तरह की महत्वाकांक्षा की पूर्ति करने की तो नहीं सोच रहे. ऐसा इसलिए क्योंकि एक  कारोबारी और पारिवारिक द्रष्टिकोण से जब परिवार का बंटवारा होता है तो तमाम तरह के खर्च और जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ जाता है और ऐसे समय का फायदा अवांछनीय तत्व के लोग उठाते हैं इस तरह का प्रत्यक्ष उधाहरण झारखण्ड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में  देख सकते हैं. जब हम अलग राज्य बनाने की मांग करते हैं तो नया राज्य जिसमें  कोई डायरेक्ट उत्पादन न होता हो या उस राज्य में  खनिज सम्पदा न हो तो उसे तमाम खर्च का बोझ उठाना होता है. साथ ही छोटे राज्यों में  अपराध को भी बढ़ावा मिलता है क्योंकि अपराधी अपराध करने के बाद दुसरे राज्य में  चले जाते हैं. वो लोग छोटे राज्य बनाये जाने के पक्षधर हैं मुझे उनकी दलीलों से सहमति  नहीं है कि  छोटे राज्यों में  शासन करने में  आसानी होगी और वे राज्य ज्यादा तरक्की करेंगे। क्योंकि अगर देखें तो देश के नक़्शे में  गुजरात, तमिलनाडु, कर्णाटक  और राजस्थान जैसे बड़े राज्य भी हैं जो कि  न केवल सुशासित हैं बल्कि प्रतिदिन तरक्की के नए आयाम गढ़ रहे हैं. जब तक शासन में  बैठे लोग या राजनेता अपने राज्य और जनता के प्रति   वफादार नहीं होंगें  तब अगर किसी मंडल को भी अगर राज्य बना दिया जाये तो वहां भी कुशासन और स्वार्थ हमेशा हावी रहेगा।
तेलंगाना का नया राज्य बनना आज सभी राजनीतिक दलों के लिए संजीवनी का काम कर रहा होगा, क्योंकि अब सभी दल अपने कार्यकर्ताओं के साथ अपने इलाके में छोटे राज्य की मांग के लिए सड़कों पर उतर आएंगे। अगर आप उनसे छोटे राज्य बनाने के 5 फायदे पूछ  लें तो शायद वो 2 से ज्यादा बता भी न पाएं। आज के hitech दौर मेपरिवहन के बेहतरीन और सहज-सुलभ साधनों के चलते प्रदेश के किसी भी छोर  से राजधानी पहुंचना मुश्किल नहीं हैं. प्रदेश अपराधमुक्त और सुशासित होने पर उसके शासक प्रदेश की GDP के बारे में  मंथन करेंगे। ऐसा होने पर हर राज्य अपनी कार्यकुशलता के बूते न केवल भारत बल्कि दुनिया में  अपनी छाप छोड़ सकने में  कामयाब हो सकेगा। 
     एक  और मजे की बात है कि  राजनीतिक और समाज सेवियों की तरह मीडिया और सोशल मीडिया में  भी इस तरह की ख़बरों को छापने  की होड़ सी लग गयी है, जबकि हमारी ये मौलिक जिम्मेदारी होनी चाहिए कि  किस बिना, क्यों, क्या, कैसे, कब इन सारे  पहलुओं पर चिंतन करने के बाद ही इस मांग को उठाना चाहिए। अगर आपको लगता है  कि बड़े राज्यों से टूटकर छोटे राज्य बनें तो लेखक को ये समझाने का प्रयास करें कि  ऐसा आखिर क्यों हो. अगर हम अपने प्रदेश के कई टुकड़े कर भी दे तो ये बड़ा सवाल है कि इससे आमजन को तो कुछ नहीं मिलेगा बल्कि तमाम नेता ही लूट -खसोट मचा देंगे।